माना कि ज़िंदगी की दौड़ में बढ़ गए हो तुम । और शोहरत की ऊंचाई चढ़ गए हो तुम । माँ बाप की खिदमत का सबक सीखा नही तुमने कैसे मान लें कि सारे सबक पढ़ गए हो तुम ।
अनिल उपहार
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