Saturday, June 22, 2019

कवि मन(कविता)21जून 2019

मन
अनुभव के बीज लिये
संवेदना की जमीन पर
टटोलता रहा नमी
कि
रचना की पैदावार
हो अच्छी,
और
भाषा की नई तहजीब गढ़ दे,
बना रहे
भाषा का
शील ।।।।।
शायद यही है
कवि मन का उदबोधन।।।

डॉ अनिल जैन उपहार

Monday, June 10, 2019

कविता(हलफनामा)11जून2019

वक्त के थपेड़े
तोड़ देना चाहते थे
सारा भरम
जो पाल रखा था
सुनहरी आंखों ने ।
देह की दस्तक पर
पड़े हर एक निशां को,
मिटा देना चाहती थी
संवेदन हीनता की स्याही,
बेचारे अल्फ़ाज़ देते रहे
गवाही हर बार की तरह ।
उसने तो लिख दिया था
हलफनामा
अपनी बेगुनाही का।

न्यायाधीश बना मन
सुनना ही कहाँ चाहता था
कोई और दलील ।
बस इंतज़ार है
फैसले का ,जिसे मानना है
नही चाहते हुए भी ।

डॉ अनिल जैन उपहार

Sunday, May 19, 2019

महक(मुक्तक)

क़तरा-ए-अश्क़ बनके टपकता रहा हूँ मै ।

अंगार    की    मानिंद  दहकता रहा हूँ मै  ।

मेंहंदी से लिखा नाम हथेली पे जो उसने 

खुशबू  से  सारी रात  महकता रहा हूँ मैं।

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अनिल डॉ अनिल जैन उपहार

Monday, May 13, 2019

परिवर्तन(कविता)

कौन कहता है कि
सिर्फ सुसराल में ही
होती है सास,ननद,देवर
मायके में भी होती है
सास,ननद,देवर
जो करते रहते है
बात बात पर टोका टोकी,
जिस दिन होती है
घर मे शांति तो-
मुहल्लेवाले समझ जाते है
खुद ब खुद
कि यातो बेटियाँ ब्याह दी गयी है
या फिर भेज दी गयी है
लंबी छुट्टी पर,
यह पढ़ने के लिए
कि वो पहले भी पराई थी
और आज भी है पराई
अपनी नियति को समझने ।

डॉ अनिल जैन उपहार

आज मातृ दिवस पर ,,,

आज मातृ दिवस पर
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कहने को तो अनपढ़ थी वो
पर ,
सबको पढ़ लेने का अज़ीब सा
हुनर था उसमें,
संस्कारों के समृद्ध विश्वविद्यालय की
कुशल प्राध्यापक थी वो।
पत्थर को तराश कर
हीरा बनाने की अदभुत कला थी
उसमे,
आशीषों में उठने वाले उसके हाथ
नित नयी प्रेरणा व ऊर्जा से
पूरे आँगन को कर देते थे
अभिमंत्रित,
काश मैं समझ पाता
माँ होने की परिभाषा
और लिख पाता कोई महाकाव्य
अपनी माँ पर।।।।

डॉ अनिल जैन उपहार

Thursday, April 25, 2019

सच्चाई(रिश्तों की)

अहम और वहम के बीच टकराते,
संबंधों के
मायावी जाल,
और आधुनिकता की भेंट चढ़ते
अटूट रिश्ते,
रुग्ण होती मानसिकता
कितना पराया कर देती है
अपनों को अपनो से।
फिर भी सुकून की
बाट जोहता यह मन
अपनाने लगता है
आभासी दुनियां को,
किसी गहरे दर्द को
जी लेने की आस में ।
यही वक्त गर दिया होता
घर के बुजुर्गों को तो-
इंसान बनने की कवायद में
पराई संस्कृति को
ढोकना नही पड़ता ।

डॉ अनिल उपहार

Wednesday, March 13, 2019

विवशता(कविता)

विवशता
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जिंदगी की जंग में
हर बार मर जाती है
आत्मा
हार जाता है आदमी
अपना अस्तित्व बचाने की
लाचारी में ,
कल्पना के पंख
लगते है निगलने
वजूद के अवशेष।
अरमानों के शिखर
चढ़ जाते है भेंट
अति आधुनिकता की होड़ में।
विवश हृदय
हर बार घरौंदे को बचाने की
जुगत में पी जाता है
लहू के घूंट
और बिखरे हुए तिनकों को
एक जुट करने की
जद्दोजहद में ,
करने लगता है अपनी सांसों की
टूटती गति से
जड़वत होते रिश्तों में
प्राण फूंकने की
असफल कोशिश ।
लेकिन अपनापन बौना हो
कर देता है समर्पण
देह की असीमित परिधि में
खोजने ,नूतन रिश्तों की
चमक दमक।
आँगन में खड़ा बुढा बरगद
लाचार हो देख रहा है
आँगन से अपनी विदाई का
मुहूर्त।।।।।

डॉ अनिल जैन उपहार