काव्यांजलि
Wednesday, February 15, 2023
मुक्तक (दिलासा)
दुहाई दे के रस्मों की ,वो दामन छोड़ जाता है ।
भिगो कर रोज़ ही पलकें ,वो सावन छोड़ जाता है ।
बड़ी शिद्दत से उसके आगमन की चिर प्रतीक्षा थी
दिलासा दे के उम्मीदों का ,दर्पण तोड़ जाता है ।
अनिल जैन उपहार
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