Monday, February 20, 2023

कविता (शिल्पी)

ओ शिल्पी 
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कोई नन्हा सा किरदार था 
वो रिश्तों के रंगमंच का ।
जीवन के सुख दुःख 
देखे थे बहुत करीब से उसने ।
एक शिल्पी सा तराशना चाहता था वो 
अनछुए पहलुओं कों ।
बनाना चाहता था 
पत्थर को भी भगवान ।
उसकी बातों में था 
अज़ीब सा सम्मोहन 
सादगी और लावण्य का 
पर्याय थी उसकी विनम्रता ।
अचानक आई वक़्त की 
तेज आंधी ने 
नफरत की ऐसी दिवार खड़ी करदी 
जिसने सारे तिलिस्म कों 
झकझोर कर रख दिया ।
किसी और दुनियां से आया 
वो किरदार 
गुमनाम बस्ती में कहीं खो गया 
शायद फिर से लौट आए वो शिल्पी 
और तराश जाये पत्थर को 
भगवान की तरह ............,

# डॉ अनिल जैन उपहार

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