काव्यांजलि
Friday, April 26, 2024
गांव की याद (मुक्तक)
रूखा सूखा खाकर भी नित नींद चैन की सोते थे।
रोज चोपालें सजती थी सब नेक फैसले होते थे।
वक्त की आंधी खूब चली रूठ गई पीपल की छांव,
याद बहुत आता है मीठे सपनों का वो अपना गांव।
डा अनिल जैन उपहार
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