काव्यांजलि
Wednesday, May 1, 2024
भाग्य के घर देर ही है (मुक्तक)
प्रारब्ध माना आंसुओं से यह समय का फेर ही है।
यति नियम सब गति समाहित भाग्य के घर देर ही है।
अनसुना सब मौन ही था अधर पढ़ते कैसे कथानक,
किरदार अपना अपना ही था कैसे कह दूं बेर ही है।
डा अनिल जैन उपहार
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