Thursday, May 30, 2024

तप्त धरा ,(गीत)

तप्त धरा, उम्मीदें हारी निर्जला उपवास करे धरती।
ऐसे में आजाओ मेघा मन की बदली आहें भरती।

कुछ झूठे आडंबर ने धरती का सीना चीर दिया।
जंगल बने रिसोर्ट यहां,भौतिकता ने अधीर किया।
मनचाहे सपनों की खातिर हमने जंगल काट दिया।
जहां गुलमोहर सजता था वहां कंकरीट से पाट दिया।

सुनो विधाता विनती यह सब कर्म हमारे  जाए है।
जिसने जैसा बोया है उसने वैसे ही फल पाए है।

डा अनिल जैन उपहार@

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