Wednesday, February 26, 2014
Saturday, February 22, 2014
Friday, February 21, 2014
Wednesday, February 12, 2014
Tuesday, February 11, 2014
--------------बेटी ---------
-------------------------------
ये बेटी घर की शोभा है जन जन कों समझाऊंगा |
इस बेटी की तुम्हें हकीकत से अवगत करवाऊंगा |
इस बेटी की खातिर घर का बच्चा बच्चा रोता है |
जब ये घर से जाती है तो सूना आँगन होता है
इस बेटी ने सारे संकट अपने नाम लिखाएं है |
इस बेटी के अरमानो के हमने दीप बुझायें है
ये बेटी परिवार के अंदर बीज प्यार के बोती है |
और बेटी हम लोगों के झूठे बर्तन धोती है |
इस बेटी कों लगा रखा है इंजेक्शन बेहोंशी का |
इस बेटी के पास मिलेगा सर्टिफिकेट निर्दोषी का |
जितना स्वागत हो गंगा का उतना ही करो किनारों का |
कभी भूलकर हनन न करना तुम इनके अधिकारों का |
२
शान बाप की रखती है ये बदनामी से डरती है |
और बुडापे में ये बेटी माँ की सेवा करती है |
ये बेटी घर में भाभी के दिन भर ताने सहती है |
जब ये बाहर जाति है तो नजर झुकाये रहती है |
इस बेटी की सच कहता हूँ लीला अपरमपारा है |
इस बेटी कों बेटी समझो ये जन जन का नारा है |
इस बेटी ने अटकाएं है हर इक दौर में रोड़े है |
इस बेटी की खातिर हमने धनुष तलक भी तोड़े है |
ये बेटी तो पर्वत भी और ये बेटी राई भी |
वाल्मीकि रामायण है और तुलसी की चोपाई भी |
इस बेटी की ममता कों तुम देखो मत ललकारो रे
इस बेटी कों ओ नादानो पेट में ही मत मारो रे |
३
ये बेटी ससुराल के अंदर बड़ी मुसीबत सहती है |
ये बेटी फिर घबराकर के आत्मदाह कर लेती है |
उनकी बेटी कुवांरी रहती जिनके घर में तंगी है |
बेटो पर भी नही लंगोटी और बेटी अधनंगी है |
और इस बेटी की कहीं कहीं तो बहुत बड़ाई होती है |
और कहीं पे इस की खातिर विकट लड़ाई होती है |
इस बेटी की आज जुबाँ पर लगा हुआ क्यों ताला है
इस बेटी पर कवियों ने भी आलखंड लिख डाला है |
नही सुरक्षित है क्यों बेटी बोलो बंद मकानों में |
इस बेटी की इज्जत हमने लुटती देखी थानों में |
मिटा सको तो आगे बढकर उसकी खुरच मिटा दो रे |
देश भक्ति जन सेवा क्या है ये सबको बतलादो रे |
४
ये बेटी है महालक्ष्मी और भूखी प्यासी भी है |
और अभागन है ये बेटी और कहीं दासी भी है |
इस बेटी के लिए भीम ने तोड़ के रख दी जंघा भी |
ये बेटी कावेरी भी है, जमना भी और गंगा भी |
खुद की चिंता नही है इसको ओरो के गम धोती है |
और ये बेटी सिर्फ़ रात में छह घंटे ही सोती है |
इस बेटी की त्याग तपस्या गली गली में बिखरी है |
ये बेटी है सती अनुसुइया और सति सावित्री है |
खुल कर के आगे आजाओ अब पूरी तयारी से |
इस बेटी कों मुक्त कराओ नफरत की बीमारी से |
आज जो मसला उलझ रहा है वो इनके सम्मान का है |
दोष अकेले नही किसी का सारे हिन्दुस्तान का है |
-------------------------------
ये बेटी घर की शोभा है जन जन कों समझाऊंगा |
इस बेटी की तुम्हें हकीकत से अवगत करवाऊंगा |
इस बेटी की खातिर घर का बच्चा बच्चा रोता है |
जब ये घर से जाती है तो सूना आँगन होता है
इस बेटी ने सारे संकट अपने नाम लिखाएं है |
इस बेटी के अरमानो के हमने दीप बुझायें है
ये बेटी परिवार के अंदर बीज प्यार के बोती है |
और बेटी हम लोगों के झूठे बर्तन धोती है |
इस बेटी कों लगा रखा है इंजेक्शन बेहोंशी का |
इस बेटी के पास मिलेगा सर्टिफिकेट निर्दोषी का |
जितना स्वागत हो गंगा का उतना ही करो किनारों का |
कभी भूलकर हनन न करना तुम इनके अधिकारों का |
२
शान बाप की रखती है ये बदनामी से डरती है |
और बुडापे में ये बेटी माँ की सेवा करती है |
ये बेटी घर में भाभी के दिन भर ताने सहती है |
जब ये बाहर जाति है तो नजर झुकाये रहती है |
इस बेटी की सच कहता हूँ लीला अपरमपारा है |
इस बेटी कों बेटी समझो ये जन जन का नारा है |
इस बेटी ने अटकाएं है हर इक दौर में रोड़े है |
इस बेटी की खातिर हमने धनुष तलक भी तोड़े है |
ये बेटी तो पर्वत भी और ये बेटी राई भी |
वाल्मीकि रामायण है और तुलसी की चोपाई भी |
इस बेटी की ममता कों तुम देखो मत ललकारो रे
इस बेटी कों ओ नादानो पेट में ही मत मारो रे |
३
ये बेटी ससुराल के अंदर बड़ी मुसीबत सहती है |
ये बेटी फिर घबराकर के आत्मदाह कर लेती है |
उनकी बेटी कुवांरी रहती जिनके घर में तंगी है |
बेटो पर भी नही लंगोटी और बेटी अधनंगी है |
और इस बेटी की कहीं कहीं तो बहुत बड़ाई होती है |
और कहीं पे इस की खातिर विकट लड़ाई होती है |
इस बेटी की आज जुबाँ पर लगा हुआ क्यों ताला है
इस बेटी पर कवियों ने भी आलखंड लिख डाला है |
नही सुरक्षित है क्यों बेटी बोलो बंद मकानों में |
इस बेटी की इज्जत हमने लुटती देखी थानों में |
मिटा सको तो आगे बढकर उसकी खुरच मिटा दो रे |
देश भक्ति जन सेवा क्या है ये सबको बतलादो रे |
४
ये बेटी है महालक्ष्मी और भूखी प्यासी भी है |
और अभागन है ये बेटी और कहीं दासी भी है |
इस बेटी के लिए भीम ने तोड़ के रख दी जंघा भी |
ये बेटी कावेरी भी है, जमना भी और गंगा भी |
खुद की चिंता नही है इसको ओरो के गम धोती है |
और ये बेटी सिर्फ़ रात में छह घंटे ही सोती है |
इस बेटी की त्याग तपस्या गली गली में बिखरी है |
ये बेटी है सती अनुसुइया और सति सावित्री है |
खुल कर के आगे आजाओ अब पूरी तयारी से |
इस बेटी कों मुक्त कराओ नफरत की बीमारी से |
आज जो मसला उलझ रहा है वो इनके सम्मान का है |
दोष अकेले नही किसी का सारे हिन्दुस्तान का है |
Monday, February 10, 2014
------------अस्मिता------------
-------------------------
हर बार देती रही
अग्नि परीक्षा |
जैसे स्त्री होना गुनाह रहा उसका,
मनु के विधान की तरह
समझा गया सभी बुराइयों की जड़,
कभी जाति के नाम पर
तो कभी
धार्मिक कर्मकाण्डो,
आडम्बरों के नाम पर |
झोंक दी गई ,बलि कर दी गई
उसकी अस्मिता |
पुरुष बन सकता है
पिता होते हुए भी सब कुछ
वह माता बनकर
कुछ और क्यों नही बन सकती ?
बचपन में पिता की चौकसी
युवावस्था में पति का पहरा
और
बुढ़ापे में पुत्र रखे उस पर नज़र
जैसे वह जन्म जात अपराधिनी हो |
कभी उसे रमणी, कामिनी ,भोग्या
पदवी से विभूषित किया गाया |
तो कभी, जिस्म के व्यापार में
धकेल दिया गया |
हमे ही आधार बना
कविता देती रही
अनुभूतियों कों दस्तक |
वैचारिक शून्यता और
आस्था का अभाव
क्या दे पायेगा ?
हमारी अस्मिता कों नया आकाश |
-----------अनिल उपहार ------------
"काव्यांजलि" नयापुरा रोड पिडावा (राजस्थान)
-------------------------
हर बार देती रही
अग्नि परीक्षा |
जैसे स्त्री होना गुनाह रहा उसका,
मनु के विधान की तरह
समझा गया सभी बुराइयों की जड़,
कभी जाति के नाम पर
तो कभी
धार्मिक कर्मकाण्डो,
आडम्बरों के नाम पर |
झोंक दी गई ,बलि कर दी गई
उसकी अस्मिता |
पुरुष बन सकता है
पिता होते हुए भी सब कुछ
वह माता बनकर
कुछ और क्यों नही बन सकती ?
बचपन में पिता की चौकसी
युवावस्था में पति का पहरा
और
बुढ़ापे में पुत्र रखे उस पर नज़र
जैसे वह जन्म जात अपराधिनी हो |
कभी उसे रमणी, कामिनी ,भोग्या
पदवी से विभूषित किया गाया |
तो कभी, जिस्म के व्यापार में
धकेल दिया गया |
हमे ही आधार बना
कविता देती रही
अनुभूतियों कों दस्तक |
वैचारिक शून्यता और
आस्था का अभाव
क्या दे पायेगा ?
हमारी अस्मिता कों नया आकाश |
-----------अनिल उपहार ------------
"काव्यांजलि" नयापुरा रोड पिडावा (राजस्थान)
Sunday, February 9, 2014
Saturday, February 8, 2014
Wednesday, February 5, 2014
-------माँ -------
------------------
तुमने संस्कारों के बीज रोंप
संघर्षो के झंझावत और
असहनीय पीड़ा भोगते हुए
लगाया था जो बिरवा ,
आज पल्लवित और पुष्पित होते देख
मन ही मन प्रसन्न होती थी तुम |
माँ !
तुम्हारी दुआओं के असर ने
चमन कों महकाया, खुशनुमा बनाया |
खुद उलझी रही पुरातन परम्पराओं, मर्यादाओं
के बंधन में |
ना कोई इच्छा, आकांक्षा, शिकायत |
बस देखना चाहती थी तुम,
अपने त्याग और समर्पण में, अपने अस्तित्व कों बनाये रखना |
अपनी तपस्या के समुचित फल से घर आँगन कों
महकते देखना |
माँ भोर की प्रथम किरण के साथ, आशीषों में उठने वाले
तुम्हारे हाथ,
नित नई प्रेरणा, ऊर्जा और स्फूर्ति देते थे |
आज जब तुम नही हो तो ढूंढता हूँ मै तुम्हें शून्य में |
और याद करता हूँ
आटा सने तुम्हारें हाथ चौका चूल्हा करते तुम्हारा साथ,
तुम्हारे चेहरे की झूर्रियो में छिपी उस जन्नत कों
जिसने दिया घर द्वार,आत्म विश्वास और संस्कार |
आज तुम्हारी कमी ने हमे ,
बना दिया है बेसहारा, बेजान और अनाथ |
कहने कों अब नहीं हो लेकिन, है तुम्हारी
दुआओं का, अहसास, विश्वास और प्रकाश
हे माँ !
तुम्हारी रिक्तता अब नहीं भर पायेगी मन के सुने पन कों |
उगासी और संस्कारों के स्पंदन कों |
लेकिन
तुम्हारी दुआओं के दीप जग मगाऐगे, रोशन करेगें
सूनी राहों कों,प्रकाशित करेंगे, उदास हवाओं कों
काश ! मै समझ पाता माँ हो ने की परिभाषा
और लिख पाता एक महाकाव्य तुम पर |
मेरे गीत और छंद पुकारते है तुमको
लेकिन मै जानता हूँ की तुम कभी नही लौटोगी उस यात्रा से
हे ! ममतामयी, देवी स्वरूपा, वात्सल्य मूर्ति माँ !
तुम्हें अनन्त प्रणाम ||
--------6 फरवरी 2007 पुण्य तिथि पर प्रकाशित -----------
------------------
तुमने संस्कारों के बीज रोंप
संघर्षो के झंझावत और
असहनीय पीड़ा भोगते हुए
लगाया था जो बिरवा ,
आज पल्लवित और पुष्पित होते देख
मन ही मन प्रसन्न होती थी तुम |
माँ !
तुम्हारी दुआओं के असर ने
चमन कों महकाया, खुशनुमा बनाया |
खुद उलझी रही पुरातन परम्पराओं, मर्यादाओं
के बंधन में |
ना कोई इच्छा, आकांक्षा, शिकायत |
बस देखना चाहती थी तुम,
अपने त्याग और समर्पण में, अपने अस्तित्व कों बनाये रखना |
अपनी तपस्या के समुचित फल से घर आँगन कों
महकते देखना |
माँ भोर की प्रथम किरण के साथ, आशीषों में उठने वाले
तुम्हारे हाथ,
नित नई प्रेरणा, ऊर्जा और स्फूर्ति देते थे |
आज जब तुम नही हो तो ढूंढता हूँ मै तुम्हें शून्य में |
और याद करता हूँ
आटा सने तुम्हारें हाथ चौका चूल्हा करते तुम्हारा साथ,
तुम्हारे चेहरे की झूर्रियो में छिपी उस जन्नत कों
जिसने दिया घर द्वार,आत्म विश्वास और संस्कार |
आज तुम्हारी कमी ने हमे ,
बना दिया है बेसहारा, बेजान और अनाथ |
कहने कों अब नहीं हो लेकिन, है तुम्हारी
दुआओं का, अहसास, विश्वास और प्रकाश
हे माँ !
तुम्हारी रिक्तता अब नहीं भर पायेगी मन के सुने पन कों |
उगासी और संस्कारों के स्पंदन कों |
लेकिन
तुम्हारी दुआओं के दीप जग मगाऐगे, रोशन करेगें
सूनी राहों कों,प्रकाशित करेंगे, उदास हवाओं कों
काश ! मै समझ पाता माँ हो ने की परिभाषा
और लिख पाता एक महाकाव्य तुम पर |
मेरे गीत और छंद पुकारते है तुमको
लेकिन मै जानता हूँ की तुम कभी नही लौटोगी उस यात्रा से
हे ! ममतामयी, देवी स्वरूपा, वात्सल्य मूर्ति माँ !
तुम्हें अनन्त प्रणाम ||
--------6 फरवरी 2007 पुण्य तिथि पर प्रकाशित -----------
Tuesday, February 4, 2014
जो झपट रहें है कुर्सी पर उनसे ये मेरा गीला है |
अधिकार बहन कों जीने का क्यों अब तक नही मिला है |
(१)
डोले भी इनके मंगवाएँ, और कोठों पर भी पहुंचादी |
जब इसने होठ हिलाए तो,दीवार में जिन्दा चुनवादी |
खामोश देखिये कहता हूँ,अब हरगिज़ नही रहूँगा |
फांसी पर भी लटकादो तुम,फिर भी यही कहूँगा |
सबसे बड़ा दुश्मन इनका,दिल्ली का लाल किला है |
(२)
ठोकर से इसको ठुकरादी,और हिस्सों में भी बांटी है |
जब इसने प्यार जगाया तो,फिर नाक भी इसकी काटी है |
दासी सा व्यव्हार किया और जुएँ में भी हारी |
भरी सभा में हम लोगों ने जबकि इसे उघारी |
अपनी अपनी कुर्सी से,कोई तिल भर नहीं हिला है |
(३)
सूखे में हमें सुलाये है,ये खुद गीले में सोयी है |
कांटा जब लगा हमारे तो,यह फूट फूट कर रोई है |
पहलें हमने अग्नि परीक्षा तक इससे दिलवादी|
उसके बाद फिर धक्के देकर घर से इसें भगादी |
बोलो इनके अहसानों का क्या बस् यही सिला है |
--------------अनिल उपहार --------------------
अधिकार बहन कों जीने का क्यों अब तक नही मिला है |
(१)
डोले भी इनके मंगवाएँ, और कोठों पर भी पहुंचादी |
जब इसने होठ हिलाए तो,दीवार में जिन्दा चुनवादी |
खामोश देखिये कहता हूँ,अब हरगिज़ नही रहूँगा |
फांसी पर भी लटकादो तुम,फिर भी यही कहूँगा |
सबसे बड़ा दुश्मन इनका,दिल्ली का लाल किला है |
(२)
ठोकर से इसको ठुकरादी,और हिस्सों में भी बांटी है |
जब इसने प्यार जगाया तो,फिर नाक भी इसकी काटी है |
दासी सा व्यव्हार किया और जुएँ में भी हारी |
भरी सभा में हम लोगों ने जबकि इसे उघारी |
अपनी अपनी कुर्सी से,कोई तिल भर नहीं हिला है |
(३)
सूखे में हमें सुलाये है,ये खुद गीले में सोयी है |
कांटा जब लगा हमारे तो,यह फूट फूट कर रोई है |
पहलें हमने अग्नि परीक्षा तक इससे दिलवादी|
उसके बाद फिर धक्के देकर घर से इसें भगादी |
बोलो इनके अहसानों का क्या बस् यही सिला है |
--------------अनिल उपहार --------------------
Monday, February 3, 2014
------इस बसंत -----
-----------------------
सांसो के मधुबन में अब भी
गीत कुंलाचे भरते रहते |
छंद और व्याकरणी पैमाने
नव सृजित अनुप्रास से बहते |
हर प्रतीक्षा आगमन की
राह सी दिखती रही |
द्वार आँगन देहरी संग
मधुमास पल लिखती रही |
धडकनों की पालकी से
हर बार मन तुमको निहारे |
गीत कविता छंद ही क्या
खुद गज़ल तुमको सँवारे |
नेह निमंत्रण तुमको है
नव गीत अधर पर तुम रख दो |
जीवन के रेखा चित्रों में
आकर बासंती रंग भरदो |
---------अनिल उपहार -----------
-----------------------
सांसो के मधुबन में अब भी
गीत कुंलाचे भरते रहते |
छंद और व्याकरणी पैमाने
नव सृजित अनुप्रास से बहते |
हर प्रतीक्षा आगमन की
राह सी दिखती रही |
द्वार आँगन देहरी संग
मधुमास पल लिखती रही |
धडकनों की पालकी से
हर बार मन तुमको निहारे |
गीत कविता छंद ही क्या
खुद गज़ल तुमको सँवारे |
नेह निमंत्रण तुमको है
नव गीत अधर पर तुम रख दो |
जीवन के रेखा चित्रों में
आकर बासंती रंग भरदो |
---------अनिल उपहार -----------
