Thursday, June 2, 2016

मुक्तक

मिलाओ हाथ कितने भी लगाओ या गले उनको

। दिए जो ज़ख्म उसने या भुला दो तुम भले उनको ।

शहीदों की शहादत कह रही है अश्क भर तुमसे

कि छप्पन इंची सीने का दिखादो दम ज़रा उनको
               (2)
। पिलाओ दूध कितना भी जहर हर बार उगलेगा

। करेगा हर घड़ी वादे मगर फितरत न बदलेगा ।

सिसकती महंदी हाथों की वो मंगल सूत्र भी बोला ।

लहू क्यों होगया पानी बताओ कब ये उबलेगा ।
               (३)
कि अब हालात बदले तो बदलने क्यों नही देते ।

सियासत के सड़े पन्नों को गलने क्यों नही देते ।

करो आज़ाद सेना को ये कहती देश की जनता

निपटना जानते है वो निपटने क्यों नही देते ।

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