Tuesday, August 30, 2016

दाना माझी घटना

आज धूमिल हर स्वप्न हो गया बापू तेरे देश का ।

शर्मसार है ज़र्रा ज़र्रा आधुनिक परिवेश का ।

मानवता की लाश लिए वो खुद कांधे पर निकल पड़ा

देख रहा आवाम यहाँ अंजाम सियासी ऐश का ।

अनिल उपहार ।।।।।

Saturday, August 20, 2016

सिंधु की जीत पर

सिंधू तुम नही हारी हो अब स्वर्णिम युग की बारी है ।

पूरा भारत नाज़ करेगा सचमुच वो तैयारी है ।

सिल्वर के तमगे के आगे सोना लगता फीका है

बिटिया तेरी उपलब्धि पर ये भारत बलिहारी है ।

अनिल उपहार

Thursday, August 18, 2016

रक्षाबंधन

हर बार तुमने
मेरी सूनी कलाई पर
अपने स्नेह के हस्ताक्षर कर
अपनी दुआओ के तमाम दस्तावेज
मेरे नाम कर दिए ।
और मैंने भी रवायतो के खाली
प्रष्ठ पर अपनी जेब के कुछ पल
तुम्हारी हथेली पर रख
अपने फ़र्ज़ की इति श्री कर ली ।
क्या सही अर्थों में
निभा पाया हूँ मै तुम्हारे स्नेह के
मुल्य कों ?
आज के इस पवित्र दिन
मेरे हाथों में बंधे इस धागे की कसम
मेरा वचन है तुम्को
की अब कोई बहन अपने भाई से
नही मांगेगी रक्षा का वचन ।
हर भाई ठीक मेरी ही तरह
निभाएगा हर वो फ़र्ज़
जिस पर सिर्फ बस सिर्फ बहन
तुम्हारा ही हक होगा ।
और दूर चौराहों पर तुम कर सकोगी
बेखोफ विचरण
हजारो की भीड़ में और हर वक़्त
खड़ा पाओगी किसी भाई को अपने
साथ ।

-----------अनिल उपहार --------

Monday, August 15, 2016

सूनापन

मलयानिल की मन्द समीर
जब छूकर गुज़रती थी
उस के अहसास को
तो रोम रोम एक अज़ीब सी
महक से महक उठता था ।

अपनी गुरुता का नही था
उसे कोई गुरुर
निश्छल और उदार मन
उसकी  वैचारिक दक्षता पर
सहज हस्ताक्षर से
प्रतीत होते थे ।

अहम और बनावटी
मसालेदार
वाक्य विन्यास
उसके शब्दकोश में
थे ही नहीं ।

यथार्थ के जिवंत दस्तावेज
पर
वक़्त के कैनवास को
रंग भर
सजीवता प्रदान करना
बखूबी आता था उसे ।

और अचानक एक दिन
अविश्वास की अमिट स्याई ने
उसके अंतर्मन को झकझोर
कर रख दिया ।

बेबाक़ बयानी शांत होगयी
निःशब्द होगया वो
और ढह गया
संबंधो का विशाल सेतु
जो जोड़ता था
मन और विश्वास के रिश्तों को ।

शायद किसी कल्पना के पंखों से
भर पाये वो उड़ान
और नवगीत सा उतर आए
समृति के धुंधले पृष्ठों पर ।

अनिल उपहार ।।।।

Sunday, August 14, 2016

स्वतंत्रता दिवस

मेरा हर गीत सारे छंद आजादी तुम्हारे नाम ।

फ़िज़ा में तैरती हर सांस आजादी तुम्हारे नाम ।

साँसों की हवा देकर के फहराया तिरंगा था

सारे जश्न हर्षोल्लास आजादी तुम्हारे नाम ।

अनिल उपहार ।।।।

Thursday, August 11, 2016

रियो खेल

निकल कर चाह आँखों से वो बन अश्रु बही होगी ।

विषमता मन की सांसों ने यूँ धड़कन से कही होगी ।

सियासत के जटिल है दाव रिसते घाव कहते है

हमारी खेल नीति में कमी कुछ तो रही होगी ।

अनिल उपहार ।।।।

Wednesday, August 10, 2016

मुक्तक (खेल)

निकल कर चाह आँखों से अश्रु बन बही होगी ।

विषमता मन की सांसों ने धड़कन से कही होगी ।

सियासत के जटिल है दाव रिसते घाव कहते है

हमारी खेल नीति में कमी कुछ तो रही होगी ।

अनिल उपहार ।।।।

Sunday, August 7, 2016

क्या यही प्यार है (मुक्तक)

रस्मे उल्फत यही क्या यही प्यार है । मौन की बीच अपने क्यूँ दीवार है । हम भी खोये हुए तुम भी बिखरे हुए तुम भी उस पार हो हम भी इस पार है । अनिल उपहार

मित्रता दिवस पर

महक जाये धरा मन की मैं ऐसा इत्र लाया हूँ ।

अदब और संस्कारों से सजा वो चित्र लाया हूँ ।

डिगा सकते नही जिसको चलन भी दोगलाई के

रखे महफूज़ दिल में राज़ ऐसे मित्र लाया हूँ ।

अनिल उपहार

Thursday, August 4, 2016

विरहन (कविता)

राह निहारते व्याकुल नयना
बाट जोहती मन देहरी
अधरों पर छाई ख़ामोशी
क्या तुमको नही दिखती ।
ओ प्रियतम
उदास पड़े सावन के झूले
काहे को विरहन को भूले ।
सिसक रही हाथों की महंदी
बेबस तुम बिन तीज भी
और मैं
तक रही हूँ हर और से आती आहट को
कि लौट आओगे तुम
और भर लोगे अपने आगोश में ।
बस प्रतीक्षा में तुम्हारी
लिख रही हूँ
मन के कोरे पृष्ठों पर
विरह के गीत
कि आओगे तुम
और दोगे उन्हें अपने स्वर ।

अनिल उपहार