आज धूमिल हर स्वप्न हो गया बापू तेरे देश का ।
शर्मसार है ज़र्रा ज़र्रा आधुनिक परिवेश का ।
मानवता की लाश लिए वो खुद कांधे पर निकल पड़ा
देख रहा आवाम यहाँ अंजाम सियासी ऐश का ।
अनिल उपहार ।।।।।
आज धूमिल हर स्वप्न हो गया बापू तेरे देश का ।
शर्मसार है ज़र्रा ज़र्रा आधुनिक परिवेश का ।
मानवता की लाश लिए वो खुद कांधे पर निकल पड़ा
देख रहा आवाम यहाँ अंजाम सियासी ऐश का ।
अनिल उपहार ।।।।।
सिंधू तुम नही हारी हो अब स्वर्णिम युग की बारी है ।
पूरा भारत नाज़ करेगा सचमुच वो तैयारी है ।
सिल्वर के तमगे के आगे सोना लगता फीका है
बिटिया तेरी उपलब्धि पर ये भारत बलिहारी है ।
अनिल उपहार
हर बार तुमने
मेरी सूनी कलाई पर
अपने स्नेह के हस्ताक्षर कर
अपनी दुआओ के तमाम दस्तावेज
मेरे नाम कर दिए ।
और मैंने भी रवायतो के खाली
प्रष्ठ पर अपनी जेब के कुछ पल
तुम्हारी हथेली पर रख
अपने फ़र्ज़ की इति श्री कर ली ।
क्या सही अर्थों में
निभा पाया हूँ मै तुम्हारे स्नेह के
मुल्य कों ?
आज के इस पवित्र दिन
मेरे हाथों में बंधे इस धागे की कसम
मेरा वचन है तुम्को
की अब कोई बहन अपने भाई से
नही मांगेगी रक्षा का वचन ।
हर भाई ठीक मेरी ही तरह
निभाएगा हर वो फ़र्ज़
जिस पर सिर्फ बस सिर्फ बहन
तुम्हारा ही हक होगा ।
और दूर चौराहों पर तुम कर सकोगी
बेखोफ विचरण
हजारो की भीड़ में और हर वक़्त
खड़ा पाओगी किसी भाई को अपने
साथ ।
-----------अनिल उपहार --------
मलयानिल की मन्द समीर
जब छूकर गुज़रती थी
उस के अहसास को
तो रोम रोम एक अज़ीब सी
महक से महक उठता था ।
अपनी गुरुता का नही था
उसे कोई गुरुर
निश्छल और उदार मन
उसकी वैचारिक दक्षता पर
सहज हस्ताक्षर से
प्रतीत होते थे ।
अहम और बनावटी
मसालेदार
वाक्य विन्यास
उसके शब्दकोश में
थे ही नहीं ।
यथार्थ के जिवंत दस्तावेज
पर
वक़्त के कैनवास को
रंग भर
सजीवता प्रदान करना
बखूबी आता था उसे ।
और अचानक एक दिन
अविश्वास की अमिट स्याई ने
उसके अंतर्मन को झकझोर
कर रख दिया ।
बेबाक़ बयानी शांत होगयी
निःशब्द होगया वो
और ढह गया
संबंधो का विशाल सेतु
जो जोड़ता था
मन और विश्वास के रिश्तों को ।
शायद किसी कल्पना के पंखों से
भर पाये वो उड़ान
और नवगीत सा उतर आए
समृति के धुंधले पृष्ठों पर ।
अनिल उपहार ।।।।
मेरा हर गीत सारे छंद आजादी तुम्हारे नाम ।
फ़िज़ा में तैरती हर सांस आजादी तुम्हारे नाम ।
साँसों की हवा देकर के फहराया तिरंगा था
सारे जश्न हर्षोल्लास आजादी तुम्हारे नाम ।
अनिल उपहार ।।।।
निकल कर चाह आँखों से वो बन अश्रु बही होगी ।
विषमता मन की सांसों ने यूँ धड़कन से कही होगी ।
सियासत के जटिल है दाव रिसते घाव कहते है
हमारी खेल नीति में कमी कुछ तो रही होगी ।
अनिल उपहार ।।।।
निकल कर चाह आँखों से अश्रु बन बही होगी ।
विषमता मन की सांसों ने धड़कन से कही होगी ।
सियासत के जटिल है दाव रिसते घाव कहते है
हमारी खेल नीति में कमी कुछ तो रही होगी ।
अनिल उपहार ।।।।
महक जाये धरा मन की मैं ऐसा इत्र लाया हूँ ।
अदब और संस्कारों से सजा वो चित्र लाया हूँ ।
डिगा सकते नही जिसको चलन भी दोगलाई के
रखे महफूज़ दिल में राज़ ऐसे मित्र लाया हूँ ।
अनिल उपहार
राह निहारते व्याकुल नयना
बाट जोहती मन देहरी
अधरों पर छाई ख़ामोशी
क्या तुमको नही दिखती ।
ओ प्रियतम
उदास पड़े सावन के झूले
काहे को विरहन को भूले ।
सिसक रही हाथों की महंदी
बेबस तुम बिन तीज भी
और मैं
तक रही हूँ हर और से आती आहट को
कि लौट आओगे तुम
और भर लोगे अपने आगोश में ।
बस प्रतीक्षा में तुम्हारी
लिख रही हूँ
मन के कोरे पृष्ठों पर
विरह के गीत
कि आओगे तुम
और दोगे उन्हें अपने स्वर ।
अनिल उपहार