Thursday, January 30, 2014
Wednesday, January 29, 2014
Tuesday, January 28, 2014
--------बेटी --------
--------------------
जिंदगी की महकती एक गंध है बेटी |
कमनीयता का सलोना एक छंद है बेटी |
त्याग और बलिदान के इतिहास में,
सेवा समर्पण से जुड़ा अनुबन्ध है बेटी |
खिले गुलाब की मधुर एक पांखुरी है बेटी |
मधुरिम है जिससे जीवन, वह माधुरी है बेटी |
ज़ख़्मी कलेजे से भी, बेदर्द ज़माने कों ,
मीठे सुनाती नगमें, वह बांसुरी है बेटी |
रिश्तों की देहरी पर, दीप प्रीत के धरे |
सम्बन्धों कों विस्तार दे, वह धुरी है बेटी |
किलकारियों से गोद भरने को ज़माने की |
आज तक मिटती रही, वह कस्तूरी है बेटी |
----------- ---------- ----------- --------
--------------------
जिंदगी की महकती एक गंध है बेटी |
कमनीयता का सलोना एक छंद है बेटी |
त्याग और बलिदान के इतिहास में,
सेवा समर्पण से जुड़ा अनुबन्ध है बेटी |
खिले गुलाब की मधुर एक पांखुरी है बेटी |
मधुरिम है जिससे जीवन, वह माधुरी है बेटी |
ज़ख़्मी कलेजे से भी, बेदर्द ज़माने कों ,
मीठे सुनाती नगमें, वह बांसुरी है बेटी |
रिश्तों की देहरी पर, दीप प्रीत के धरे |
सम्बन्धों कों विस्तार दे, वह धुरी है बेटी |
किलकारियों से गोद भरने को ज़माने की |
आज तक मिटती रही, वह कस्तूरी है बेटी |
----------- ---------- ----------- --------
Monday, January 27, 2014
जोड़ कर दोनों हाथों कों श्रद्धाओं के,
तुझको करता हूँ अर्पित सुमन शारदे |
दास चरणों का अपने मुझे जानकर
करले स्वीकार मेरा नमन शारदे |
(१)
चाहे लेखक या शायर हो चाहे कवि
तेरी नज़रों में हें ये बराबर सभी |
ले के कन्या कुमारी से कश्मीर तक,
हें ये तेरा ही सारा चमन शारदे |
(२)
प्यार मुझको मिला और जो शोहरत मिली
सच तो ये हें की तेरी बदोलत मिली |
तू जो करदे करम तो चमक जाऊंगा,
ऐसा कहता हें अब मेरा मन शारदे |
(३)
ये दिखावा नही मेरा ईमान है
जान में जब तलक भी मेरे जान है |
गीत प्यारो मोहब्बत के मैं गाऊंगा,
दे रहा हूँ में तुझको वचन शारदे
----------------------------
( अनिल उपहार )
|
तुझको करता हूँ अर्पित सुमन शारदे |
दास चरणों का अपने मुझे जानकर
करले स्वीकार मेरा नमन शारदे |
(१)
चाहे लेखक या शायर हो चाहे कवि
तेरी नज़रों में हें ये बराबर सभी |
ले के कन्या कुमारी से कश्मीर तक,
हें ये तेरा ही सारा चमन शारदे |
(२)
प्यार मुझको मिला और जो शोहरत मिली
सच तो ये हें की तेरी बदोलत मिली |
तू जो करदे करम तो चमक जाऊंगा,
ऐसा कहता हें अब मेरा मन शारदे |
(३)
ये दिखावा नही मेरा ईमान है
जान में जब तलक भी मेरे जान है |
गीत प्यारो मोहब्बत के मैं गाऊंगा,
दे रहा हूँ में तुझको वचन शारदे
----------------------------
( अनिल उपहार )
|
--- - ----- बहन का अधिकार------
जो झपट रहें है कुर्सी पर उनसे ये मेरा गिला है |
अधिकार बहन कों जीने का क्यों अब तक नही मिला है |
(१)
डोले भी इनके मंगवाएँ, और कोठों पर भी पहुंचादी |
जब इसने होठ हिलाए तो,दीवार में जिन्दा चुनवादी |
खामोश देखिये कहता हूँ,अब हरगिज़ नही रहूँगा |
फांसी पर भी लटकादो तुम,फिर भी यही कहूँगा |
सबसे बड़ा दुश्मन इनका,दिल्ली का लाल किला है |
(२)
ठोकर से इसको ठुकरादी,और हिस्सों में भी बांटी है |
जब इसने प्यार जगाया तो,फिर नाक भी इसकी काटी है |
दासी सा व्यव्हार किया और जुएँ में भी हारी |
भरी सभा में हम लोगों ने जबकि इसे उघारी |
अपनी अपनी कुर्सी से,कोई तिल भर नहीं हिला है |
(३)
सूखे में हमें सुलाये है,ये खुद गीले में सोयी है |
कांटा जब लगा हमारे तो,यह फूट फूट कर रोई है |
पहलें हमने अग्नि परीक्षा तक इससे दिलवादी|
उसके बाद फिर धक्के देकर घर से इसें भगादी |
बोलो इनके अहसानों का क्या बस् यही सिला है |
--------------अनिल उपहार --------------------
जो झपट रहें है कुर्सी पर उनसे ये मेरा गिला है |
अधिकार बहन कों जीने का क्यों अब तक नही मिला है |
(१)
डोले भी इनके मंगवाएँ, और कोठों पर भी पहुंचादी |
जब इसने होठ हिलाए तो,दीवार में जिन्दा चुनवादी |
खामोश देखिये कहता हूँ,अब हरगिज़ नही रहूँगा |
फांसी पर भी लटकादो तुम,फिर भी यही कहूँगा |
सबसे बड़ा दुश्मन इनका,दिल्ली का लाल किला है |
(२)
ठोकर से इसको ठुकरादी,और हिस्सों में भी बांटी है |
जब इसने प्यार जगाया तो,फिर नाक भी इसकी काटी है |
दासी सा व्यव्हार किया और जुएँ में भी हारी |
भरी सभा में हम लोगों ने जबकि इसे उघारी |
अपनी अपनी कुर्सी से,कोई तिल भर नहीं हिला है |
(३)
सूखे में हमें सुलाये है,ये खुद गीले में सोयी है |
कांटा जब लगा हमारे तो,यह फूट फूट कर रोई है |
पहलें हमने अग्नि परीक्षा तक इससे दिलवादी|
उसके बाद फिर धक्के देकर घर से इसें भगादी |
बोलो इनके अहसानों का क्या बस् यही सिला है |
--------------अनिल उपहार --------------------
Thursday, January 23, 2014
Tuesday, January 21, 2014
गज़ल
-----------
मैं गज़ल कहता हूँ, तुम हाथ उठाये रखिये
अपनी अंगडाई कों,मेहराब बनाये रखिये |
सोंचता हूँ मैं तेरी मांग में तारे भर दूँ
मेरी तसवीर कों सीने से लगाये रखिये |
मेरा वादा है मैं आऊंगा जरुर आऊंगा
तुम तो बस घर के चरागों कों बुझाये रखिये |
तुम मेरी और जो देखोगे तो मर जाऊंगा
बस मेरे सामने पलकों कों झुकाये रखिये |
तेरे हाथों से मेरे दिल कों सुकूं मिलता है
दो घड़ी तुम मेरे सीने कों दबाये रखिये |
तुमको बदनाम ना करदे ये जमाने वाले
ऐसे लोगों से तुम अब खुद कों बचाये रखिये |
------ ----- ----- (अनिल उपहार )
'काव्यांजलि' पिडावा (राजस्थान)
गज़ल
-----------
उनके सियाह बालों में अब भी महक तो हें
बस् सिर्फ रंग बदला हें लेकिन चमक तो हें |
में क्या बताऊ अब मेरे महबूब कि कमर
पतली नहीँ तो क्या हुआ उसमे लचक तो है |
हम जैसे बद नसीबों कों यारों जहान में
जीने का हक नही तो मरने का हक तो है |
मिलने कों बेक़रार हें कंगन से चुडियां
माना ये दोनों दूर है फिर भी खनक तो है |
माना कि उनका रंग हें उपहार सांवला
सब कुछ हें फिर भी चेहरे के उपर नमक तो है |
---------(अनिल उपहार )
-----------
उनके सियाह बालों में अब भी महक तो हें
बस् सिर्फ रंग बदला हें लेकिन चमक तो हें |
में क्या बताऊ अब मेरे महबूब कि कमर
पतली नहीँ तो क्या हुआ उसमे लचक तो है |
हम जैसे बद नसीबों कों यारों जहान में
जीने का हक नही तो मरने का हक तो है |
मिलने कों बेक़रार हें कंगन से चुडियां
माना ये दोनों दूर है फिर भी खनक तो है |
सब कुछ हें फिर भी चेहरे के उपर नमक तो है |
---------(अनिल उपहार )
गज़ल
----------
आज कि रात जुबाँ पर ना लगाओ ताले
वरना बदनाम हमे कर देंगे दुनिया वाले |
रात दिन दिल में यही फिक्र लगी रहती है
जान ले ले ना मेरी ये तेरे गेसू काले |
दिल में हसरत हें यही में तेरा दीदार करूं
भेज कर खत मुझे इक बार तो घर बुलवाले |
तेरे कदमों में मैं खुद कों भी निछावर कर दू
आजा आजा मेरी तकदीर बदलने वाले |
मैं ये समझूंगा मेरी जीत यकीनन होगी
अपने उपहार कों इक बार जो तू अपनाले |
------(अनिल उपहार)------
----------
आज कि रात जुबाँ पर ना लगाओ ताले
वरना बदनाम हमे कर देंगे दुनिया वाले |
रात दिन दिल में यही फिक्र लगी रहती है
जान ले ले ना मेरी ये तेरे गेसू काले |
दिल में हसरत हें यही में तेरा दीदार करूं
भेज कर खत मुझे इक बार तो घर बुलवाले |
तेरे कदमों में मैं खुद कों भी निछावर कर दू
आजा आजा मेरी तकदीर बदलने वाले |
मैं ये समझूंगा मेरी जीत यकीनन होगी
अपने उपहार कों इक बार जो तू अपनाले |
------(अनिल उपहार)------
हाँ ये औरत है
-------------------------
रोज की भागम भाग,
सीने में दबाये दहकती आग
वक़्त की मार,
तानों की बोछार,
दोहरी जिंदगी कों
ढो रही सदियों से |
अपनों से छली गई,
तंदूर में तली गई,
समर्पण की त्रासदी कों
कब तलक पीती रहेगी ?
हाँ
यह औरत है |
सब कुछ सहती रहेगी |
बीबी किसी की
बेटी किसी की
बहन किसी की
सब कुछ लुटाकर
अपनों के बीच
खुद कों मिटाकर
देहरी के दीप सी
जलती रहेगी |
हाँ
यह औरत है
सब कुछ सहती रहेगी |
----(अनिल उपहार )
'काव्यांजलि' पिडावा जिला
झालावाड (राज.)326034
-------------------------
रोज की भागम भाग,
सीने में दबाये दहकती आग
वक़्त की मार,
तानों की बोछार,
दोहरी जिंदगी कों
ढो रही सदियों से |
अपनों से छली गई,
तंदूर में तली गई,
समर्पण की त्रासदी कों
कब तलक पीती रहेगी ?
हाँ
यह औरत है |
सब कुछ सहती रहेगी |
बीबी किसी की
बेटी किसी की
बहन किसी की
सब कुछ लुटाकर
अपनों के बीच
खुद कों मिटाकर
देहरी के दीप सी
जलती रहेगी |
हाँ
यह औरत है
सब कुछ सहती रहेगी |
----(अनिल उपहार )
'काव्यांजलि' पिडावा जिला
झालावाड (राज.)326034
--- कविता ---
---------------
मैं नहीं जानता
विचारों की गहराई,
असीमित भावों का
विशाल शब्द कोश |
पर हाँ,
इतना अहसास आज भी
जिन्दा है
अंतर मन में कहीं |
कविता,
अभिव्यक्ति के उच्छ्रंखल आँगन
में
नहीं खेलती |
वो पल पल निखरती है
शब्दों के सागर में,
संवरती है तहज़ीब के लहज़े में,
बस् सिखाती है
भाषा में आदमी होने की तमीज़ |
----अनिल उपहार ---
---------------
मैं नहीं जानता
विचारों की गहराई,
असीमित भावों का
विशाल शब्द कोश |
पर हाँ,
इतना अहसास आज भी
जिन्दा है
अंतर मन में कहीं |
कविता,
अभिव्यक्ति के उच्छ्रंखल आँगन
में
नहीं खेलती |
वो पल पल निखरती है
शब्दों के सागर में,
संवरती है तहज़ीब के लहज़े में,
बस् सिखाती है
भाषा में आदमी होने की तमीज़ |
----अनिल उपहार ---
गज़ल
-------------
तुम बिन हें सूनी सूनी मेरे दिल की ये राहें |
सावन में भी जलाती हें खामोश निगाहें |
माना कि बहुत दूर हें तू मेरी पहुँच से
बैचेन बहुत करती हें पर तेरी निगाहें |
जो कर रहे है प्यार उसे सारी जिंदगी
दोनों ही निभाने कि कसम बैठ के खाए |
तुम घर बसा के अपना कहीं पर भी जाइये
लेकिन रहेगी साथ तेरे मेरी दुआए |
तू आरजू हें मेरी तो में आरजू तेरी |
चाहत कि हरेक रस्म निभाती हें निगाहें |
दो चीज जिसके पास हें वो खुश नसीब है
आशीर्वाद बाप का और माँ कि दुआए |
जो जख्म मिले हमको वो ताजा हें आज भी
लेकिन ये शर्त हें कि किसी कों ना दिखाए |
---- ----- -----
( अनिल उपहार )
-------------
तुम बिन हें सूनी सूनी मेरे दिल की ये राहें |
सावन में भी जलाती हें खामोश निगाहें |
माना कि बहुत दूर हें तू मेरी पहुँच से
बैचेन बहुत करती हें पर तेरी निगाहें |
जो कर रहे है प्यार उसे सारी जिंदगी
दोनों ही निभाने कि कसम बैठ के खाए |
तुम घर बसा के अपना कहीं पर भी जाइये
लेकिन रहेगी साथ तेरे मेरी दुआए |
तू आरजू हें मेरी तो में आरजू तेरी |
चाहत कि हरेक रस्म निभाती हें निगाहें |
दो चीज जिसके पास हें वो खुश नसीब है
आशीर्वाद बाप का और माँ कि दुआए |
जो जख्म मिले हमको वो ताजा हें आज भी
लेकिन ये शर्त हें कि किसी कों ना दिखाए |
---- ----- -----
( अनिल उपहार )
सरस्वती वंदना
सरस्वती वंदना
------------------------
जोड़ कर दोनों हाथों कों श्रद्धाओं के,
तुझको करता हूँ अर्पित सुमन शारदे |
दास चरणों का अपने मुझे जानकर
करले स्वीकार मेरा नमन शारदे |
(१)
चाहे लेखक या शायर हो चाहे कवि
तेरी नज़रों में हें ये बराबर सभी |
ले के कन्या कुमारी से कश्मीर तक,
हें ये तेरा ही सारा चमन शारदे |
(२)
प्यार मुझको मिला और जो शोहरत मिली
सच तो ये हें की तेरी बदोलत मिली |
तू जो करदे करम तो चमक जाऊंगा,
ऐसा कहता हें अब मेरा मन शारदे |
(३)
ये दिखावा नही मेरा ईमान है
जान में जब तलक भी मेरे जान है |
गीत प्यारो मोहब्बत के मैं गाऊंगा,
दे रहा हूँ में तुझको वचन शारदे
----------------------------
( अनिल उपहार )
|
---अनिल उपहार ---
------------------------
जोड़ कर दोनों हाथों कों श्रद्धाओं के,
तुझको करता हूँ अर्पित सुमन शारदे |
दास चरणों का अपने मुझे जानकर
करले स्वीकार मेरा नमन शारदे |
(१)
चाहे लेखक या शायर हो चाहे कवि
तेरी नज़रों में हें ये बराबर सभी |
ले के कन्या कुमारी से कश्मीर तक,
हें ये तेरा ही सारा चमन शारदे |
(२)
प्यार मुझको मिला और जो शोहरत मिली
सच तो ये हें की तेरी बदोलत मिली |
तू जो करदे करम तो चमक जाऊंगा,
ऐसा कहता हें अब मेरा मन शारदे |
(३)
ये दिखावा नही मेरा ईमान है
जान में जब तलक भी मेरे जान है |
गीत प्यारो मोहब्बत के मैं गाऊंगा,
दे रहा हूँ में तुझको वचन शारदे
----------------------------
( अनिल उपहार )
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---अनिल उपहार ---
गज़ल
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तुम बिन हें सूनी सूनी मेरे दिल की ये राहें |
सावन में भी जलाती हें खामोश निगाहें |
माना कि बहुत दूर हें तू मेरी पहुँच से
बैचेन बहुत करती हें पर तेरी निगाहें |
जो कर रहे है प्यार उसे सारी जिंदगी
दोनों ही निभाने कि कसम बैठ के खाए |
तुम घर बसा के अपना कहीं पर भी जाइये
लेकिन रहेगी साथ तेरे मेरी दुआए |
तू आरजू हें मेरी तो में आरजू तेरी |
चाहत कि हरेक रस्म निभाती हें निगाहें |
दो चीज जिसके पास हें वो खुश नसीब है
आशीर्वाद बाप का और माँ कि दुआए |
जो जख्म मिले हमको वो ताजा हें आज भी
लेकिन ये शर्त हें कि किसी कों ना दिखाए |
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( अनिल उपहार )
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तुम बिन हें सूनी सूनी मेरे दिल की ये राहें |
सावन में भी जलाती हें खामोश निगाहें |
माना कि बहुत दूर हें तू मेरी पहुँच से
बैचेन बहुत करती हें पर तेरी निगाहें |
जो कर रहे है प्यार उसे सारी जिंदगी
दोनों ही निभाने कि कसम बैठ के खाए |
तुम घर बसा के अपना कहीं पर भी जाइये
लेकिन रहेगी साथ तेरे मेरी दुआए |
तू आरजू हें मेरी तो में आरजू तेरी |
चाहत कि हरेक रस्म निभाती हें निगाहें |
दो चीज जिसके पास हें वो खुश नसीब है
आशीर्वाद बाप का और माँ कि दुआए |
जो जख्म मिले हमको वो ताजा हें आज भी
लेकिन ये शर्त हें कि किसी कों ना दिखाए |
---- ----- -----
( अनिल उपहार )
बेटी
जो झपट रहें है कुर्सी पर उनसे ये मेरा गीला है |
अधिकार बहन कों जीने का क्यों अब तक नही मिला है |
(१)
डोले भी इनके मंगवाएँ, और कोठों पर भी पहुंचादी |
जब इसने होठ हिलाए तो,दीवार में जिन्दा चुनवादी |
खामोश देखिये कहता हूँ,अब हरगिज़ नही रहूँगा |
फांसी पर भी लटकादो तुम,फिर भी यही कहूँगा |
सबसे बड़ा दुश्मन इनका,दिल्ली का लाल किला है |
(२)
ठोकर से इसको ठुकरादी,और हिस्सों में भी बांटी है |
जब इसने प्यार जगाया तो,फिर नाक भी इसकी काटी है |
दासी सा व्यव्हार किया और जुएँ में भी हारी |
भरी सभा में हम लोगों ने जबकि इसे उघारी |
अपनी अपनी कुर्सी से,कोई तिल भर नहीं हिला है |
(३)
सूखे में हमें सुलाये है,ये खुद गीले में सोयी है |
कांटा जब लगा हमारे तो,यह फूट फूट कर रोई है |
पहलें हमने अग्नि परीक्षा तक इससे दिलवादी|
उसके बाद फिर धक्के देकर घर से इसें भगादी |
बोलो इनके अहसानों का क्या बस् यही सिला है |
--------------अनिल उपहार ---------------------
जो झपट रहें है कुर्सी पर उनसे ये मेरा गीला है |
अधिकार बहन कों जीने का क्यों अब तक नही मिला है |
(१)
डोले भी इनके मंगवाएँ, और कोठों पर भी पहुंचादी |
जब इसने होठ हिलाए तो,दीवार में जिन्दा चुनवादी |
खामोश देखिये कहता हूँ,अब हरगिज़ नही रहूँगा |
फांसी पर भी लटकादो तुम,फिर भी यही कहूँगा |
सबसे बड़ा दुश्मन इनका,दिल्ली का लाल किला है |
(२)
ठोकर से इसको ठुकरादी,और हिस्सों में भी बांटी है |
जब इसने प्यार जगाया तो,फिर नाक भी इसकी काटी है |
दासी सा व्यव्हार किया और जुएँ में भी हारी |
भरी सभा में हम लोगों ने जबकि इसे उघारी |
अपनी अपनी कुर्सी से,कोई तिल भर नहीं हिला है |
(३)
सूखे में हमें सुलाये है,ये खुद गीले में सोयी है |
कांटा जब लगा हमारे तो,यह फूट फूट कर रोई है |
पहलें हमने अग्नि परीक्षा तक इससे दिलवादी|
उसके बाद फिर धक्के देकर घर से इसें भगादी |
बोलो इनके अहसानों का क्या बस् यही सिला है |
--------------अनिल उपहार ---------------------
आस्था, आलम्बन ,विश्वास,
सदियों से यही तो चाहा था,
तुमसे इस समाज ने |
कभी तुम ययाति की बेटी
माधवी बन ,उत्सर्ग करती रही |
कभी त्रेता की रेणुका बन,
नही पूछ पाई कोई प्रश्न
अपने पति या पुत्रों से |
कभी तुम अहिल्या बन,
युग युगों तक इन्द्र के पाप का
दण्ड भोगती रही-
जबकि जानते थे सब,
की तुम छली गई हो,
द्रोपदी के चीर हरण से लेकर
सामूहिक बलात्कार कांड तक |
हर बार तुम्हीं होती रही,
सामाजिक एवं मानसिक रुग्णता की
शिकार |
तुम्हारी इस दशा के लिए
आखिर कौन है जिम्मेदार ?
समाज की सामंत वादी सोच
या
सुन्न पड़ी संवेदना |
कभी तुम कबीर की वाणी का
आधार बनी,
तो कभी जायसी के स्वच्छंद प्रेम
की अभिव्यक्ति-
फिर भी ,हर बार तिल तिल कर
मरती रही हो तुम, और
यह समाज हर बार शब्दों के मरहम से
भुनाता रहा तुम्हें |
निर्भया |तुम्हांरी मौत ने
खड़े किये है अनेक सवाल |
वो सारे प्रश्न है आज भी
अनुत्तरित |
जो शाश्वत, सार्वभौमिक, और सर्वकालिक
उत्तर अवश्य ही ना बन पाए |
इन्हीं में गुम है तुम्हारी रूह के
ताज़ा ज़ख्म,
जो बयां कर रहें है-
औरत होने की अंत हीन पीड़ा कों |
-----अनिल उपहार -------
सदियों से यही तो चाहा था,
तुमसे इस समाज ने |
कभी तुम ययाति की बेटी
माधवी बन ,उत्सर्ग करती रही |
कभी त्रेता की रेणुका बन,
नही पूछ पाई कोई प्रश्न
अपने पति या पुत्रों से |
कभी तुम अहिल्या बन,
युग युगों तक इन्द्र के पाप का
दण्ड भोगती रही-
जबकि जानते थे सब,
की तुम छली गई हो,
द्रोपदी के चीर हरण से लेकर
सामूहिक बलात्कार कांड तक |
हर बार तुम्हीं होती रही,
सामाजिक एवं मानसिक रुग्णता की
शिकार |
तुम्हारी इस दशा के लिए
आखिर कौन है जिम्मेदार ?
समाज की सामंत वादी सोच
या
सुन्न पड़ी संवेदना |
कभी तुम कबीर की वाणी का
आधार बनी,
तो कभी जायसी के स्वच्छंद प्रेम
की अभिव्यक्ति-
फिर भी ,हर बार तिल तिल कर
मरती रही हो तुम, और
यह समाज हर बार शब्दों के मरहम से
भुनाता रहा तुम्हें |
निर्भया |तुम्हांरी मौत ने
खड़े किये है अनेक सवाल |
वो सारे प्रश्न है आज भी
अनुत्तरित |
जो शाश्वत, सार्वभौमिक, और सर्वकालिक
उत्तर अवश्य ही ना बन पाए |
इन्हीं में गुम है तुम्हारी रूह के
ताज़ा ज़ख्म,
जो बयां कर रहें है-
औरत होने की अंत हीन पीड़ा कों |
-----अनिल उपहार -------
--- - स्मृति ---
-----------------------------
जीवन जल उलीचती
तुम्हारी यादें,
देह की हर दस्तक में
घोल रही है मिठास |
मुझे याद है,
तुम्हारी वो पहली चिठ्ठी -
उसका हर एक हरफ,
महक रहा है आज भी
तुम्हारी खुशबू से |
मुझे याद है,
तुम्हारे हाथों की वो सुर्ख
मेहंदी,
जिस पर लिखा था मेरा नाम,
ठीक उसी तरह,
जैसे नये वर्ष की अगवानी में
कोई नव यौवना
लिख रही हो प्रेम का अध्याय
शुभाशंषा की तरह |
--------अनिल उपहार ------
अर्चना के दीप ले उतारूँ तेरी आरती माँ
वंदना के फूल हैं वरदान कुछ दीजिए |
कलम निर्झरनी बने, शब्दों की नित बहती रहें
लेखनी निर्भय बने ऐसा वर दीजियें |
नील कंठनी कलम रहें सदा ही स्वछंद
गीत मीठे बोलू ऐसे मीठे बोल दीजिए
वीणा पाणी वीणा की झंकार से झंकार मन
ह्रदय के तारों कों वीणा से जोड़ दीजिए |
-----------------अनिल उपहार ----------



