Friday, December 8, 2017

कविता(कुहासा)

सामाजिक रिश्तों की
आद्रता में
भीगता हृदय,
सम्मोहन की छांव से
बन जाता है
आस्था का तीर्थ ।

बौखलाते प्रश्न चिन्ह
और गलबहियाँ करती
अनागत की अंतहीन
प्रतीक्षा
प्रेयसी के हिय की
तुलसी को
जल चढ़ाता
निश्छल मन
नापना चाहता है
समर्पण की गहराई ।
और तुम हो कि,
चाहते हो
फिर से
खो जाना
विरह के कुहासे में ।।।।।।

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Monday, December 4, 2017

मन की बात(कविता)

तुम्हारी मस्फुरियत
के मायने समझ रहा है
हर कोई ।
लेकिन उनींदी आंखों की
कसक
सिर्फ जानते है हम ।
वाकई क्या गज़ब
सियासत है तन्हाई की ।
समय के दस्तावेज पर
खामोशी की लिखावट
पढ़ पाने का हुनर
हर किसी को
हासिल तो नही होता है न ।।।।।

#अनिल जैन उपहार

Thursday, November 30, 2017

मुक्तक(प्रणय गीत)

इक प्रणय गीत है एक प्रणय छंद है ।

तन से तन को मिली जो मधुर गंध है ।

देखा बासंती मन तो नयन कह उठे

प्यास का तृप्ति से आज अनुबंध है ।

अनिल जैन उपहार

Wednesday, November 29, 2017

मुक्तक (सबक)

माना कि ज़िंदगी की दौड़ में बढ़ गए हो तुम ।
और शोहरत की ऊंचाई चढ़ गए हो तुम ।
माँ बाप की खिदमत का सबक सीखा नही तुमने
कैसे मान लें कि सारे सबक पढ़ गए हो तुम ।

अनिल उपहार

Tuesday, November 28, 2017

कविता

संवेदना के आईने में
नही उभरता
अब कोई अक्स
अपनेपन का ,

शब्दों के रुमाल
झाड़ने लगते है
स्वार्थ की महीन
धूल ।

गरीब होती
वैचारिक सम्पदा
अस्तित्व खोते
संस्कार युक्त वैभव ने

लिख दिया है लेखा जोखा
समय के भाल पर ।

इतिहास लिखेगा
वृतांत
कर्मो की स्याही से ,
तब नही होगा सामर्थ्य
बांचने का ,
पथराई आंखों में ।।।।

#अनिल जैन उपहार
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मुक्तक(चूम लेती है )

मेरी यादों की कश्ती में वो दुनियाँ घूम लेता है ।

गुज़ारे साथ जो लम्हे उन्ही पर झूम लेता है ।

छुआ जिस दिन उसे मैंने तो सुध बुध भूल बैठा वो

आईना सामने रख कर के खुद को चूम लेता है ।

#@कॉपीराइट अनिल उपहार

Friday, November 17, 2017

मुक्तक

किसी की याद में शामो सहर,
              तपना लिखा होगा |

उनींदी आँख को उसने हँसी,
             सपना लिखा होगा |

मेरा होकर भी जो मेरा ,कभी
                भी हो नही पाया |

मुकद्दर में नही शायद मिलन,
             अपना लिखा होगा |

अनिल उपहार

Thursday, November 16, 2017

कविता(लिख-जोखा)

संवेदना के आईने में
नही उभरता
अब कोई अक्स
अपनेपन का ,

शब्दों के रुमाल
झाड़ने लगते है
स्वार्थ की महीन
धूल ।

गरीब होती
वैचारिक सम्पदा
अस्तित्व खोते
संस्कार युक्त वैभव ने

लिख दिया है लेखा जोखा
समय के भाल पर ।

इतिहास लिखेगा
वृतांत
कर्मो की स्याही से ,
तब नही होगा सामर्थ्य
बांचने का ,
पथराई आंखों में ।।।।

#अनिल जैन उपहार
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Saturday, October 28, 2017

एकाकीपन (कविता)

अनंत संवेदनाओ से भरे
एकाकीपन के बादल
आंखों के पोर की
गहराई नाप लेने को
है आतुर ।
समर्पण की त्रासदी को झेल
बेकसूर आदमी के
हलफनामे की तरह
अति विश्वास की तहरीर
बांच लेना चाहते है
पथराये नयन ,
न्यायाधीश बना मन
मानने को तैयार नही
कोई दलील ।
सजा भुगतने को विवश
निर्दोष और निश्छल हृदय
अनचाही कैद में
हो जाना चाहता है कैद ,
फिर से अलगांव की
आग में झुलस
स्मृति के खंडहरों में
गुम हो जाने के लिए ।
****************

अनिल जैन उपहार

Sunday, October 22, 2017

सम्मोहन

एक अजीब सा सम्मोहन था
उसकी बातों में ,
उसका हर्फ़ हर्फ़
अदबी इतिहास की
गवाही सा प्रतीत  होता
था ।
उसकी लेखनी
छंद बन गीतों में ढल जाया
करती थी ।
संस्कारों की पाठशाला का
कुशल विद्यार्थी था वो ।
अवसाद के बादल
कभी बरस नही पाए थे
उसके आँगन में ।
संवेदना के दो चार छीटें ही
काफ़ी थे उसके
किसी की पीड़ा को
हर लेने के लिए ।
थोती विरदावलियाँ
भाती ही नही थी उसे ।
शायद यही अच्छाइयां
हर बार थोप देती थी
प्रश्न चिन्ह
उसकी कार्यशैली पर ,
ओर वो होजाता था निशब्द
अपनी बेगुनाही के
सबूत जुटाने में ।

अनिल जैन उपहार

Tuesday, October 10, 2017

कविता(दीप माला)

अप्रतिम सौंदर्य और
उदात्त विचारों को
अभिव्यक्त करता
उसका संवाद ।
अनु भव के केनवास पर
कुशलता से उकेर देना
मन के जज़्बात ।
बखूबी आता था उसे
हल कर देना
रिश्तो का गणित
संवेदना की हर इबारत
लिख जाती थी
उसके आने की
अनकही दासता ।
प्रतीक्षा थी तो बस
उसके लौट आने की ।
कोई दीप माला लिये
बैठा है
मन की चौखट पर ।

अनिल उपहार

Friday, September 8, 2017

कविता (अनागत)

शब्दों का प्रवाह
जब गुज़रता है
भावनाओं के सेतु से,
समझ के नवद्वार
स्मृति के रास्ते
देने लगते है
आमंत्रण विचारों कों ।
कि आओ ,
और लिख दो
कोई खंड काव्य
वेदना की गोद मे
बहते हुए अश्रुओं पर ।
तब
नन्हा सा सांझ का दीप
बुहारने लगता है
मन के कुहासे कों
किसी अनागत की
प्रतीक्षा में ।

अनिल जैन उपहार

Saturday, August 26, 2017

राम रहीम की घटना पर ,(छंद)

चमचो की चमचागिरी,अफसरों की अफ़सरगिरी ,नेताओं की नेतागिरी ,देखली जी देश ने ।

दुष्टों की भी दुष्टगिरी,भ्रष्टों की भी भ्रष्टगिरी, गुंडो की भी गुंडागिरी देखली जी देश ने ।

वोटों के ही सर पे दुशाले ताने खड़े जो मुलायम की दादागिरी देखली जी देश ने ।

पुरुषों की गोद मे जा धम से पसर जाना ,राधे माँ की राधागिरी देखली जी देश ने ।

अनिल जैन उपहार

Tuesday, August 22, 2017

कविता(सपने)

अंतहीन ही तो है
ये सपनो का सफर ।
जिसे मन ने कभी
चाहा नही
आंखों ने उसे देख लिया
हृदय जिसे पढ़ना चाहता है
आंखे उसे देख ती भी कहाँ है
रिश्तो के साये में
अलसाते संवेदना के पखेरू
द्वार पर आहट देती
मौन की तिलिस्मी चादर
कोई तो है जो खो गया है
यादों के कोहरे में ।

अनिल उपहार

Saturday, August 12, 2017

मुक्तक

तू ही किरदार रहा है मेरे फसाने का ।

तू ही अंदाज़े बयां है मेरे तराने का ।

मेरे अधरों पे जो मचले वो गीत भी तू है

तुझसे सीखा है हुनर मैंने गुनगुनाने का ।

अनिल जैन उपहार

Friday, August 11, 2017

हामिद अंसारी(मुक्तक)

हमने तो गुलशन सौंपा  ,तुम मसल गए फुलवारी को ।

दाग लगा दामन पर माँ के ,निकल गए मक्कारी को ।

पलकों पर था तुम्हे बिठाया ,पल भर में ही भूल गए ।

औकात दिखा कर नीचे गिरना ,देख लिया अंसारी को ।

अनिल उपहार

Friday, August 4, 2017

बिन तेरे(कविता)

सरगोशियां करती रही
खामोशियाँ
रात भर
भेद जानने को आतुर
रात का अंतिम प्रहर ।
जल रहा है अंतस का
पोर पोर ।
सावन की बूंदों ने
डाल दिया हो घी जैसे ।
उदास मन
भीगते नयन
मन की दहलीज के
सूने पन को ताकती
अनचाही आहट की प्रतीक्षा में ,
बिस्तर की सिलवटों ने
कर दिए है दर्ज
अपने  बयान ।
मन मुजरिम सा
काट रहा है सजा
अपने निर्दोष होने की ।
बिन तेरे,,,,,,,,

अनिल जैन उपहार

Thursday, August 3, 2017

हिंदी एक वैज्ञानिक भाषा है और कोई भी अक्षर वैसा क्यूँ है उसके पीछे कुछ कारण है , अंग्रेजी भाषा में ये बात देखने में नहीं आती | ______________________ क, ख, ग, घ, ङ- कंठव्य कहे गए, क्योंकि इनके उच्चारण के समय ध्वनि कंठ से निकलती है। एक बार बोल कर देखिये | च, छ, ज, झ,ञ- तालव्य कहे गए, क्योंकि इनके उच्चारण के समय जीभ तालू से लगती है। एक बार बोल कर देखिये | ट, ठ, ड, ढ , ण- मूर्धन्य कहे गए, क्योंकि इनका उच्चारण जीभ के मूर्धा से लगने पर ही सम्भव है। एक बार बोल कर देखिये | 😀 त, थ, द, ध, न- दंतीय कहे गए, क्योंकि इनके उच्चारण के समय जीभ दांतों से लगती है। एक बार बोल कर देखिये | प, फ, ब, भ, म,- ओष्ठ्य कहे गए, क्योंकि इनका उच्चारण ओठों के मिलने पर ही होता है। एक बार बोल कर देखिये । 😀 ________________________ हम अपनी भाषा पर गर्व करते हैं ये सही है परन्तु लोगो को इसका कारण भी बताईये | इतनी वैज्ञानिकता दुनिया की किसी भाषा मे नही है कृपया इस ज्ञान की जानकारी सभी को अग्र प्रेषित करें ।

Monday, July 24, 2017

सच्चाई(कविता)

ये जो तुम्हारे सख्त लहज़े की
तहरीर  है न
बड़ा नर्म अहसास
कराती है
पथराई आंखों को ।
शायद इन्ही में गुम तो
नहीं
हौसलो के पर
जो खींच लाये है
तुम्हे धरती से
आसमा पर ।

अनिल जैन उपहार

Wednesday, July 19, 2017

सावन का सच(कविता)

स्मृति के खंडबिम्ब
और कौंधते शब्द
नित देते
मेरी सर्जना को
संदर्भ ।
ठीक उसी तरह
सावन की पहली बून्द ने
लिख दिया था
मिलन के पृष्ठ पर
अलसायी सुबह का सच ।
गवाह है वो हस्ताक्षर
जो आज भी दर्ज़ है
सुनहरी यादों के दस्तावेज पर ।

अनिल उपहार

Wednesday, July 12, 2017

मुक्तक (अहसास)

बनके नगमा कोई मीठा सा संवर जाए हम ।

हार कर दिल की हुकूमत और निखर जाए हम ।

दूर तक पसरा जो सन्नाटा आओ कम कर दें

भीगें अहसास की बारिश में बिखर जाए हम ।

अनिल जैन उपहार

Monday, July 3, 2017

बारिश (कविता)

अतीत की पगडंडी पर
चलते चलते
खो जाता है मन
दिवास्वप्नों में ।
नेह की बारिश में
भीगता तनमन
अकल्पनीय बंधनो में
जकड़ना
मुठ्ठी में कसकर
पकड़ लेना
आशाओ की बालू
ठीक उसी तरह
जिस तरह तुमने बांधा था
अपने मोहपाश में ।
सुरमई धूप का खिलना
यादों के दरीचों का खुलना
कोई दस्तक तो नही है न ,,
तुम्हारे आगमन की ।
माटी की सौंधी गंध
बता रही है कि-
कोई भीग गया है फिर से
पहली बारिश में
और रख दिया है
सावन अपनी पलकों पर ।।।

अनिल जैन उपहार

Wednesday, June 28, 2017

मुक्तक( तुम न बदल जाना)

मै समर्पण लिखूं अहसास बन तू ढल जाना ।

दिल के सागर में तू दरिया सी बन मचल जाना ।

मेरी सांसों में समाया है तू धड़कन बन कर

चाहे बदले ये ज़माना न तुम बदल जाना ।
अनिल जैन उपहार

Saturday, June 24, 2017

कविता(आभासी दुनियाँ)

पल पल प्रतिपल
तंग होती
संवेदना की चौखट ।
और विस्तार पाता
स्वार्थ का गहरा आयतन ,
ऊपर से अपनी मज़बूत जड़े पसारता
आभासी दुनियां का
मकड़ जाल ।
संचार क्रांति की भेंट चढ़ता
बचपन
कभी अपनों से बैठ कर
बतियालिया होता
बूढ़े माँ बाप की कुछ उम्र
बढ़ जाती ।
हम वही तो बो रहे है
जिसे काटना है
हमारे अपने अंश को
सौपने के लिए वही सब
जो हमने अपनो को
दिया है ।।।।।
अनिल उपहार

Thursday, June 22, 2017

कविता(भागदौड़)

अपार संभावनाएं तलाशता जीवन
लोकप्रियता के
भीड़ भाड़ वाले चौराहो पर
रुकना नही चाहता ,
भौतिकता के  मद्धिम प्रकाश में
रिश्तों का सेतु ,
फिजूल लगने लगता है उसे ।
क्या यही मानसिक शांति है ?
यह भटकाव
क्षणिक सुख तो दे सकता है
पर वो सुकून नही
जिसे तुम खोज रहे हो
बरसों से ।

अनिल उपहार

Monday, June 19, 2017

कविता(चुनोती)

भले ही वक़्त से लड़ना सीख लिया तुमने
गरल तन्हाई का
पीना भी
सीख लिया तुमने ।
जटिल प्रश्न
पल भर में हल कर गए
शिकस्त जब भी मिली
खुद अश्क पिये
और ज़ख्मों को
चुपचाप सिल गए ।
यह शिल्प कहाँ से लाए तुम
हर शाख इस कारीगरी से
हैरान है ,
शायद दर्द पल भर का
मेहमान है ।

अनिल जैन उपहार

Friday, June 16, 2017

कविता(सम्मोहन)

एक अजीब सा सम्मोहन था
उसकी बातों में ,
उसका हर्फ़ हर्फ़
अदबी इतिहास की
गवाही सा प्रतीत  होता
था ।
उसकी लेखनी
छंद बन गीतों में ढल जाया
करती थी ।
संस्कारों की पाठशाला का
कुशल विद्यार्थी था वो ।
अवसाद के बादल
कभी बरस नही पाए थे
उसके आँगन में ।
संवेदना के दो चार छीटें ही
काफ़ी थे उसके
किसी की पीड़ा को
हर लेने के लिए ।
थोती विरदावलियाँ
भाती ही नही थी उसे ।
शायद यही अच्छाइयां
हर बार थोप देती थी
प्रश्न चिन्ह
उसकी कार्यशैली पर ,
ओर वो होजाता था निशब्द
अपनी बेगुनाही के
सबूत जुटाने में ।

अनिल जैन उपहार

Thursday, June 15, 2017

कविता,(एकाकीपन)

अज़ीब भटकाव है न
रिश्तों के दरमियाँ
बुलंदी हमे अहसास
नहीं होने देती
किसी को अपना बना लेना
या किसी का बन कर रह जाना।
शोहरत का हिमाला
ओर कामयाबी की मीनारे,
ऊँचा तो उठाती है
पर कहीं हमे इंसानी
जज़्बातों से गिरा न दे
जरूरत है तो बस
संबंधों के भव्यमहल पर
अपनेपन की आधारशिला
रखने की ।
तभी सार्थक होगा
तुम में मै ओर
मुझमे तेरे होने का
जीवंत अहसास
जो दूर कर पाएगा
मन के एकाकीपन
की खाई को ।

अनिल जैन उपहार

Tuesday, June 13, 2017

अन्नदाता (मुक्तक)

मेरे देश का अन्नदाता

भूखा रहके भी सबुरी से काम लेता है ।

ओढ़कर बेबसी ज़िल्लत के जाम लेता है ।

रहन है जिसकी जवानी बुढापा कर्जे में

हँस के पुरखों की विरासत वो थाम लेता है ।

अनिल जैन उपहार

बचपन(मुक्तक)

सारे डर माँ के वो आँचल में छुपा लेता है ।

तंग भी करता है पर सबको हँसा देता है ।

वो भी क्या दौरे मुहब्बत का हंसी लम्हा था

याद करता हूँ तो बचपन का पता देता है ।

अनिल जैन उपहार

Thursday, June 8, 2017

मुक्तक ,(नही की जाती,,)

बे वफाओ से वफादारी नही की जाती ।
थोती बातो से कलाकारी नही की जाती ।
जो हकीकत है बयां करना घर्म है अपना
हमसे तो धर्म से गद्दारी नही की जाती ।
अनिल जैन उपहार

Sunday, June 4, 2017

कविता,,(हुनर)

कामयाबी का गुरु शिखर था वो
रिश्तों का शब्दकोश
बड़ा समृद्ध था
उसका
पत्थर को तराश
हीरा बना देने की कला भी
बखूबी आती थी उसे ।
तभी तो
अच्छे और बूरे का भेद
जान नहीं पाया कभी
वैचारिक दक्षता भी
ज़बरदस्त थी उसमें
तभी तो ज़माने की
नज़र से देख लेने का
सलीका रास आगया था उसे ।
शायद वक़्त की तेज आंधी ने
सिखा दिया था उसे
बिखर कर संभलने का चलन ।

अनिल उपहार