भागफल सा प्यार तुम्हारा और गुणक सी तेरी जुदाई ।
समीकरण सा तेरा मिलना योगफल सी बनी खुदाई ।
हासिल सा तेरा रूठ के जाना और व्याकरण भी गहरा है
रिश्तों के इस अंक गणित को भोली आँखें जान न पाई ।
-------------अनिल उपहार -------
भागफल सा प्यार तुम्हारा और गुणक सी तेरी जुदाई ।
समीकरण सा तेरा मिलना योगफल सी बनी खुदाई ।
हासिल सा तेरा रूठ के जाना और व्याकरण भी गहरा है
रिश्तों के इस अंक गणित को भोली आँखें जान न पाई ।
-------------अनिल उपहार -------
मैंने कितनी रातें काटी
तुम पर कोई गीत लिखूं ।
उजियारों की चौखट चूमी
तुमसा ही मन मीत लिखूं ।
द्वार द्वार आँगन देहरी पर
मैंने वंदनवार सजाए ।
कलम डुबोई आँसुओ में
नित शब्दों के अर्घ चढ़ाए ।
अर्थ खोगए व्याकरणी पैमाने
किन शब्दों में रीत लिखूं ।
मन से मन का मिलन करा दे
सचमुच ऐसी प्रीत लिखूं ।
--------अनिल उपहार -------
संस्कार विहीन होता परिवेश
और मर्यादा खोरहा आज का
युवा
रिश्तों के अंक गणित कों
क्या समझ पायेगा
और दाग दार होते दामन कों
किस तरह बचायेगा ।
उलझे है कुछ सवाल
जो चाहते है समाधान ।
क्या ????कोई देगा जवाब ।।।।।
------अनिल उपहार ---
लिखी पाती ये असुवन से सजन तुम लौट आना फिर ।
तेरे चरणों की हूँ दासी न इतना भूल जाना फिर ।
तेरे हर फ़र्ज़ को दिल से सलामी देती हूँ सुनले
मेरे इस प्यार के आगे न अपने पग डिगाना फिर ।
--------अनिल उपहार -----
मेरे हर गीत का अंदाज़ ओ आगाज़ है तू ।
मेरी सांसों में जो खनके वो मधुर साज है तू ।
तुझसे सीखा है हुनर मैंने लिखने पढने का
तू ही किरदार है मेरा मेरी आवाज़ है तू ।
---------अनिल उपहार ------
रिश्तों की पगडण्डी पर
चलते चलते
भौतिकता की फिसलन में
संभल नही पाते कदम
और आधुनिकता की
बैसाखियों में ढूंढते सहारा
क्या मंजिल तक
पहुंचा सकेंगे
कल्पना के पंख ।
परिंदों ने कहाँ सीखा
ये हुनर
आसमां ने तो नही की
कभी फिरका परस्ती ।
फिर हमने कहाँ से
सीख लिया
शून्य होती संवेदना का
गणित ।
शायद पढ़ लिया है हमने
संवाद हीनता का व्याकरण
तभी भूल गए हम अहसासो
की शब्दावली ।
-----------अनिल उपहार -------
पाती
-----------
मेरे आराध्य
मेरी शौहरत के हिमाला के
गुरु शिखर ।
तुमकों कैसे लिखूं
और
कैसे गाउँ गीतों में ।
जब जब भी गाता हूँ
आँखे बहने लगती है
झरने सी ।
कभी श्रद्धा भावनाओं के अर्घ
चढाने लगती है ।
तो कभी मन
अपनी अतल गहराई से
करने लगता है प्रेम का अभिषेक ।
और चाहता है
चरण वंदना कर
उस अलौकिक और मधुर अहसास को
जीना
जो मिला है मुझे पुण्य कर्मों से ।
यह सिर्फ निवेदन है अधिकार नही है मेरा ।।।।।
------अनिल उपहार ------
पहली बार मिले थे हम तुम यार पता ज़िंदा रखना ।
जब जब हमने की है खताएं यार खता ज़िंदा रखना ।
हमने तो बस मांगी दुआएँ तेरी ही खुशहाली की
ग़म में भी मुस्काने की तुम यार अदा ज़िंदा रखना ।
--------------अनिल उपहार ----/-
किये तुमसे जो वादे थे उन्हें बस तोड़ आये है ।
बिना बैसाखी के पीछे तेरे हम दौड़ आये है ।
वफ़ा की राह में कंकर मिले या फिर मिले कांटे
किसी के दर पे दिल की हर तमन्ना छोड़ आये है ।
--------अनिल उपहार
खुदा के वास्ते उसको मेरा दिलदार लिख देना ।
यही है आरज़ू दिल की हँसी संसार लिख देना ।
सुनो शिल्पी तराशा तुमने देकर चोट पत्थर को
कभी तुम प्रीत लिख देना कभी मनुहार लिख देना ।
----------@अनिल उपहार
दर्द लिख कर उम्र भर की दासता ढोते रहे ।
इक अदद मुस्कान को पहचान वो खोते रहे ।
अपने हिस्से की ख़ुशी भी रास न आई जिन्हें
शब्द के फनकार कवि भी प्यार कर रोते रहे ।
-------अनिल उपहार -----
छंद कविता गीत की पहचान हो ।
शब्दावली हो प्रीत की यशगान हो ।
यूँ भले ही कह नहीं पाया ज़ुबा से
मैं ग़ज़ल हूँ मीत तुम अरकान हो ।
------अनिल उपहार -----
ओ वीणापाणी आज ह्रदय के तारों को झंकृत करदो।
बैठो जीभ की जाजम पर हर इक शब्द अलंकृत करदो।
दौलत और ये शौहरत तो बस तेरी ही तो बदौलत है
मेरे गीत ग़ज़ल छन्दों को आओ आज पारिष्कृत करदो।
अनिल उपहार। ।।।।।
ज़िन्दगी के गीत का वो अनछुआ किरदार है ।
हर्फ़ है वो प्यार का या इक मधुर तकरार है ।
हर सलीका था गजब जब तोड़ आया वो भरम
हर अदा कहने लगी ये प्यार का इज़हार है ।
अनिल उपहार
अरमानो की दहलीज़ पर
जलाते रहे हर बार
प्रतीक्षा के दीये
फ़िज़ा में घुली
स्वार्थ की गर्द
कर देती थी एक चुभन पैदा
किरकिरी सी
मन की आँखें
हो उठती थी लाल
एक अनचाहे दर्द से ।
शब्दकोश था विवश
नही कोई उपमा और
उपमान ।
अनुप्रास भी तो था अधूरा
कोई कैसे लिखता
टूट कर बिखर जाने की वज़ह ।
अनिल उपहार
महिला दिवस पर
-------------
यूँ कहने कों तो हर बार कराते रहे
मेरी महानता का बोध ।
पढ़ाते रहे भरोसे का पाठ
पर खुद नहीं कर पाए भरोसा मुझ पर
हर बार मेरे अस्तित्व पर लगाते रहे
प्रश्न चिन्ह ।
करते रहे मेरे वज़ूद को तार तार ।
जबकि जानते थे तुम कि
छली गयी हूँ मैं
शब्दों के मरहम से भुनाई जाती रही हूँ मैं ।
तुम ही गढ़ते रहे उपमान
सजाते रहे प्रतिमान
अपनी शब्दावलियों से ।
मैं थामे रही रिश्तों का व्याकरण
निभाती रही अपना धर्म
इस उम्मीद से कि तुम बनोगे मेरे विशवास
की बैसाखी
दोगे वही ओहदा सम्मान
जिसे गाते रहे हो तुम
अपने गीतों और कविताओं में
दे पाओगे ???????????
------अनिल उपहार ----/
वह पगली
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मर्यादा की दहलीज़ पर
रोज़ जलाती है वो दीया
अदब और संस्कारों का ।
उसके धवल परिधान
चिढ़ाते थे
चंद्रमा की शुभ्र ज्योत्स्ना कों ।
सूरज की पहली किरण
बिखेरती थी अपनी
स्वर्ण रश्मियाँ
उसके सूने आँगन में ।
उसकी कलम का एक एक शब्द
रचता था साहित्य के भव्य महल
और
हर शिखर उसकी छंदमाल से
हो उठता था अभिमंत्रित ।
उसकी बातों में था
गज़ब का सम्मोहन ।
हर कोई खिंचा आता था
उसको पढ़ने ।
उसे कहाँ था अहसास
खुद की गुरुता का ।
वो तो अनजान अल्हड
भरती रहती प्रकृति के रंग
अपनी कूँची से ।
लेकिन बोल उठता था उसका मौन भी
उसकी हर तस्वीर में ।
हाँ मैंने पढ़ा था कई बार
उसकी आँखों में छलकते दर्द कों
महसूस किया था
उसकी सिसकती सांसो कों
शायद वह सीख रही थी
खुद से लड़ना
पर हाय!
संवाद हीनता की पराकाष्टा
को क्या कहें ।
हिंदी कविता की तरह
हर बार
छली जाती रही वह ..........
एक पगली ऐसी भी ।
--------अनिल उपहार --------
मेरे बालों को उँगलियों से कौन गूंथेगा ।
मेरे ज़ख्मों को दे के थपकी कौन चूमेगा ।
टकटकी बांध के दरवाजे पे दौड़ी आना
बेटा आया के नहीं अब ये कौन पूछेगा ।
अनिल उपहार
अरमानो की दहलीज़ पर
जलाते रहे हर बार
प्रतीक्षा के दीये
फ़िज़ा में घुली
स्वार्थ की गर्द
कर देती थी एक चुभन पैदा
किरकिरी सी
मन की आँखें
हो उठती थी लाल
एक अनचाहे दर्द से ।
शब्दकोश था विवश
नही कोई उपमा और
उपमान ।
अनुप्रास भी तो था अधूरा
कोई कैसे लिखता
टूट कर बिखर जाने की वज़ह ।
अनिल उपहार
बस नज़र में प्यार का आधार होना चाहिए ।
चाहतों का हर चमन गुलज़ार होना चाहिए ।
सर्द रातों में लगे जब चाँद भी जलने कहीं
प्यार में सौदा नही बस प्यार होना चाहिए ।
अनिल उपहार
शोहरत तो हुई हासिल मगर ये याद भी रखना ।
ये वो हिमाला है जो टिकने नही देता ।
नेकियाँ की है तो उन्हें महफूज़ भी रखना
दिखावे का चलन कभी फलने नही देता ।
माँ बाप की खिदमत का जो कर लिया सौदा
बस सोच का ये दायरा उठने नही देता ।
अनिल उपहार
अभावों के शीला लेख पर लिखी इबारत है पिता ।
दुर्दिनों के दौर में भी थपकी भरी हिदायत है पिता ।
तमाम उम्र तरसते रहै खुद छत के वास्ते ।
बच्चों के हौसलों की जियारत है पिता ।
,,,,,,,अनिल उपहार
अरमानो की दहलीज़ पर
जलाते रहे हर बार
प्रतीक्षा के दिये
फ़िज़ा में घुली स्वार्थ की गर्द
कर देती थी एक चुभन पैदा
किरकिरी सी
मन की आँखें हो उठती थी लाल
एक अनचाहे दर्द से ।
शब्दकोश था विवश
नही कोई उपमा और उपमान ।
अनुप्रास भी तो था अधूरा
कोई कैसे लिखता
टूट कर बिखर जाने की वज़ह ।
अनिल उपहार
घर के जो गमले में नागफणी उगाई तो
तुम्हे रात रानी भला रास नही आएगी ।
हुकूमत करते जो रहे अंधियारों की तो
उजालो की किरणे भी आँखें फेर जाऐगी ।
मतवाले रूप पर करना गुरुर मत
प्रीत की पवन से सुहास नही आएगी ।
चाहत के बादलों से करोगे किनारा गर
अधरों पे उगी प्यास फिर लौट जायेगी ।
अनिल उपहार
आस अधरों पर लिए वो तिश्नगी तक आगये ।
दर्द के सहरा में भटके और नदी तक आगये ।
उससे ग़ाफ़िल हम रहे जीते रहे अपनी तरह
पीर जब बढ़ने लगी तो बन्दगी तक आगये ।
अनिल उपहार
कभी उदासियों में आँख नम नही करना ।
ज़माना कुछ भी कहे कोई गम नही करना
साथ हमने जो गुज़ारे है उन पलों की कसम
रहें कहीं भी मगर प्यार कम नही करना ।
अनिल उपहार
मैं छंद बना और तू गीत होगई ।
रिश्तों की नर्म डोर बंधी प्रीत होगई ।
सन्दर्भ बदलता रहा रस्मो रिवाज़ का
मैं मीत बना और तू मनमीत हो गई ।
अनिल उपहार
मिलाओ हाथ कितने भी लगाओ या गले उनको
। दिए जो ज़ख्म उसने या भुला दो तुम भले उनको ।
शहीदों की शहादत कह रही है अश्क भर तुमसे
कि छप्पन इंची सीने का दिखादो दम ज़रा उनको
(2)
। पिलाओ दूध कितना भी जहर हर बार उगलेगा
। करेगा हर घड़ी वादे मगर फितरत न बदलेगा ।
सिसकती महंदी हाथों की वो मंगल सूत्र भी बोला ।
लहू क्यों होगया पानी बताओ कब ये उबलेगा ।
(३)
कि अब हालात बदले तो बदलने क्यों नही देते ।
सियासत के सड़े पन्नों को गलने क्यों नही देते ।
करो आज़ाद सेना को ये कहती देश की जनता
निपटना जानते है वो निपटने क्यों नही देते ।
मैंने हर गीत ग़ज़ल में तुम्ही को गाया है ।
रहूँ कहीं भी मगर साथ तेरा साया है ।
बेवफा कह के बुलाऊँ तो बुलाऊँ कैसे
प्यार करने का हुनर भी तो तुमसे पाया है
।।।।।।।।।। ( 2 )
मेरा मकसद है यही तू सदा ही शाद रहे ।
उसकी रहमत से दिल की बस्ती भी आबाद रहे
मिलन के साथ जुदाई का दौर आता है
मैं तुझमे और तू मुझमे ही ज़िंदाबाद रहे ।
(3)
कभी उदासियों में आँख नम नही करना ।
ज़माना कुछ भी कहे कोई गम नही करना
साथ हमने जो गुज़ारे है उन पलों की कसम
रहें कहीं भी मगर प्यार कम नहीं करना ।
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परिंदों के परों को देख मैं उड़ान लिखता हूँ ।
बिलखते भूख से बचपन का मैं अरमान लिखता हूँ ।
चलन रिश्ते निभाने का बुज़ुर्गो से ही तो सीखा
बुज़ुर्गो की विरासत को मैं हिंदुस्तान लिखता हूँ
। ,,,,,,,,
अंजानो आरती के स्वर यहाँ हर दिन मचलते है ।
चरागों के ही साये रात के तेवर बदलते है
। रहें होंगे उजाले कैद महलों में कहीं पहलें
यहाँ जुगनू भी ऐसे है जो सूरज से निकलते है ।
अनिल उपहार।।।।।।
कि कोई वक़्त की बैसाखियों को छल नही सकता ।
सफर में तो यहाँ कोई अकेला चल नही सकता ।
लगी हो आग कितनी भी भले ही सर से पैरो तक
कि हो साया बुज़ुर्गो का वो सच में जल नहीं सकता ।
अनिल उपहार