Wednesday, March 19, 2014

--------होली------------
-------------------------
 फागुन  की  मस्ती  प्रिये  

सूना  तुम  बिन  राग   

अलगोजे   की  तान  पर  

लगा  चिढाने   फाग  |

सजन  तुम  क्यों  नही  आये 

विरह  की  आग  जलाये  |

-------------------------------------

अनिल उपहार 

Thursday, March 13, 2014

दूर दर्शन की निदेशक डॉ .रेखा व्यास और अन्य कवि गण----------------------------7.3.2014
दूर दर्शन के राष्ट्रीय कवि सम्मलेन में ड्रेसिंग रूम में -----डॉ .यशोधरा (झारखण्ड )डॉ .सरिता सलिल (छत्तीसगढ़)उपेन्द्र अणु (उदयपुर )मनोज गुर्जर (मावली )अनिल उपहार (पिडावा )

Monday, March 10, 2014

देहली कवि सम्मलेन ---------ड्रेसिंग रूम में -----अनिल उपहार ---मनोज गुर्जर --------उपेन्द्र जी अणु 

Tuesday, February 11, 2014

           --------------बेटी ---------
            -------------------------------

ये  बेटी  घर  की  शोभा  है  जन  जन  कों  समझाऊंगा | 

इस  बेटी  की  तुम्हें हकीकत  से  अवगत  करवाऊंगा  |

इस  बेटी  की खातिर  घर  का  बच्चा  बच्चा  रोता  है |

जब  ये  घर  से  जाती  है  तो  सूना  आँगन  होता  है  

इस  बेटी  ने  सारे  संकट  अपने  नाम  लिखाएं  है | 

इस  बेटी  के  अरमानो  के  हमने  दीप  बुझायें  है  

ये  बेटी  परिवार  के अंदर  बीज  प्यार के  बोती है |

और  बेटी  हम  लोगों  के  झूठे  बर्तन  धोती  है  |

इस  बेटी  कों  लगा  रखा  है  इंजेक्शन  बेहोंशी  का |

इस  बेटी  के  पास  मिलेगा  सर्टिफिकेट  निर्दोषी  का  |

जितना  स्वागत हो  गंगा  का  उतना   ही  करो  किनारों  का  |

कभी  भूलकर  हनन  न  करना  तुम  इनके  अधिकारों का  |
                                   
                                    २ 

शान   बाप  की  रखती  है  ये  बदनामी  से  डरती है  |

और  बुडापे  में  ये  बेटी  माँ की  सेवा  करती  है  |

ये  बेटी  घर  में  भाभी   के  दिन  भर  ताने  सहती  है  |

जब  ये  बाहर  जाति  है  तो  नजर  झुकाये रहती  है |

इस  बेटी  की  सच   कहता  हूँ  लीला  अपरमपारा  है  |

इस  बेटी  कों  बेटी  समझो  ये  जन जन  का  नारा  है  |

इस  बेटी  ने  अटकाएं  है  हर  इक  दौर  में  रोड़े  है |

इस  बेटी  की  खातिर  हमने  धनुष  तलक  भी  तोड़े  है  |

ये  बेटी  तो  पर्वत  भी   और  ये  बेटी  राई   भी  |

वाल्मीकि   रामायण  है  और  तुलसी की चोपाई  भी  |

इस  बेटी  की  ममता  कों  तुम  देखो  मत  ललकारो  रे  

इस  बेटी  कों  ओ   नादानो  पेट  में  ही  मत  मारो  रे  |
                              
                                  ३ 

ये  बेटी  ससुराल  के  अंदर  बड़ी  मुसीबत  सहती   है  |

ये  बेटी  फिर  घबराकर के   आत्मदाह  कर  लेती  है  |

उनकी  बेटी  कुवांरी  रहती  जिनके  घर  में  तंगी  है |

बेटो  पर भी  नही   लंगोटी  और  बेटी  अधनंगी  है  |

और  इस  बेटी  की  कहीं  कहीं  तो  बहुत  बड़ाई  होती  है  |

और  कहीं   पे  इस  की  खातिर  विकट  लड़ाई  होती  है  |

इस  बेटी की आज  जुबाँ  पर  लगा  हुआ  क्यों  ताला  है 

इस बेटी  पर  कवियों  ने  भी  आलखंड  लिख  डाला  है  |

नही  सुरक्षित  है  क्यों  बेटी  बोलो  बंद  मकानों  में  |

इस  बेटी की  इज्जत  हमने  लुटती   देखी  थानों  में  |

मिटा  सको  तो  आगे  बढकर  उसकी  खुरच  मिटा  दो रे  |

देश  भक्ति  जन  सेवा  क्या  है  ये  सबको  बतलादो  रे  |
                       
                                 ४ 

ये  बेटी  है  महालक्ष्मी  और  भूखी  प्यासी  भी  है  |

और  अभागन  है  ये  बेटी  और  कहीं  दासी  भी  है  |

इस  बेटी  के  लिए  भीम  ने  तोड़  के  रख  दी  जंघा  भी  |

ये  बेटी  कावेरी  भी  है, जमना  भी  और  गंगा   भी  |

खुद  की  चिंता  नही  है  इसको  ओरो  के  गम  धोती  है  |

और  ये  बेटी  सिर्फ़ रात  में   छह  घंटे  ही  सोती  है  |

इस  बेटी  की  त्याग  तपस्या  गली  गली  में  बिखरी  है  |

ये  बेटी  है  सती  अनुसुइया  और  सति  सावित्री   है  |

खुल  कर  के आगे  आजाओ  अब  पूरी  तयारी   से |

इस  बेटी  कों  मुक्त  कराओ  नफरत  की  बीमारी  से  |

आज  जो  मसला  उलझ   रहा है  वो  इनके  सम्मान  का  है  |

दोष  अकेले  नही  किसी  का  सारे  हिन्दुस्तान  का  है   |  





  

Monday, February 10, 2014

------------अस्मिता------------
-------------------------

हर  बार  देती  रही 
अग्नि  परीक्षा |
जैसे  स्त्री  होना  गुनाह  रहा  उसका,
मनु  के  विधान  की  तरह 
समझा  गया  सभी  बुराइयों  की  जड़,
कभी  जाति  के  नाम  पर 
तो  कभी 
धार्मिक  कर्मकाण्डो,
आडम्बरों  के  नाम  पर |
झोंक  दी  गई ,बलि  कर  दी  गई 
उसकी  अस्मिता |
पुरुष  बन  सकता  है 
पिता  होते  हुए  भी  सब  कुछ 
वह  माता  बनकर 
कुछ  और  क्यों  नही  बन  सकती ?
बचपन  में  पिता  की  चौकसी 
युवावस्था  में  पति  का  पहरा 
और 
बुढ़ापे  में  पुत्र  रखे  उस  पर  नज़र 
जैसे  वह  जन्म  जात  अपराधिनी  हो |
कभी  उसे  रमणी, कामिनी ,भोग्या
पदवी  से  विभूषित  किया  गाया |
तो  कभी, जिस्म  के  व्यापार  में 
धकेल  दिया  गया |
हमे  ही  आधार  बना 
कविता  देती  रही 
अनुभूतियों  कों  दस्तक |
वैचारिक  शून्यता  और 
आस्था  का  अभाव
क्या  दे  पायेगा ?
हमारी  अस्मिता  कों  नया   आकाश |

-----------अनिल उपहार ------------
"काव्यांजलि" नयापुरा रोड पिडावा (राजस्थान) 
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ललितपुर  कवि सम्मलेन में गीत पढते हुए 

Saturday, February 8, 2014

lalitpur kavi sammelan me jhumti janta...............

Wednesday, February 5, 2014

-------माँ -------
------------------
तुमने  संस्कारों  के  बीज  रोंप

संघर्षो  के  झंझावत  और  

असहनीय  पीड़ा  भोगते  हुए 

लगाया  था  जो  बिरवा ,

आज  पल्लवित  और  पुष्पित  होते  देख 

मन  ही  मन  प्रसन्न  होती  थी  तुम  |

                 माँ !

तुम्हारी  दुआओं  के  असर  ने  

चमन  कों  महकाया, खुशनुमा  बनाया  |

खुद  उलझी  रही  पुरातन  परम्पराओं, मर्यादाओं 

         के बंधन     में  |

ना  कोई  इच्छा,   आकांक्षा,  शिकायत  |

बस  देखना  चाहती  थी  तुम, 

अपने  त्याग  और  समर्पण  में, अपने  अस्तित्व  कों  बनाये  रखना  |

अपनी  तपस्या  के  समुचित  फल  से  घर आँगन  कों 

                महकते  देखना  |

माँ  भोर  की प्रथम  किरण  के  साथ, आशीषों  में  उठने वाले 

             तुम्हारे हाथ,

नित  नई प्रेरणा, ऊर्जा  और  स्फूर्ति  देते  थे |

आज  जब  तुम  नही  हो  तो ढूंढता  हूँ  मै  तुम्हें  शून्य  में |

              और  याद  करता  हूँ 

आटा   सने  तुम्हारें हाथ चौका  चूल्हा  करते  तुम्हारा  साथ,

तुम्हारे  चेहरे  की  झूर्रियो  में  छिपी  उस  जन्नत  कों 

जिसने  दिया  घर   द्वार,आत्म  विश्वास  और  संस्कार |

आज  तुम्हारी  कमी  ने हमे ,

बना दिया है बेसहारा,  बेजान और  अनाथ |

कहने  कों  अब  नहीं हो  लेकिन, है तुम्हारी 

दुआओं का, अहसास, विश्वास  और प्रकाश 

  हे माँ  !

तुम्हारी  रिक्तता  अब नहीं  भर  पायेगी  मन के सुने पन कों |

उगासी  और  संस्कारों  के स्पंदन  कों |

लेकिन 

तुम्हारी  दुआओं  के  दीप  जग मगाऐगे,  रोशन  करेगें

सूनी  राहों  कों,प्रकाशित  करेंगे, उदास  हवाओं कों 

काश ! मै  समझ  पाता  माँ  हो  ने  की  परिभाषा 

और  लिख  पाता  एक  महाकाव्य  तुम  पर |

मेरे  गीत  और  छंद  पुकारते  है  तुमको 

लेकिन  मै जानता  हूँ  की  तुम कभी  नही लौटोगी  उस  यात्रा  से 

हे  ! ममतामयी, देवी  स्वरूपा, वात्सल्य मूर्ति  माँ  !

तुम्हें  अनन्त प्रणाम  ||

--------6 फरवरी 2007 पुण्य तिथि पर प्रकाशित -----------


Tuesday, February 4, 2014

जो झपट रहें है कुर्सी पर उनसे ये मेरा गीला है |
अधिकार बहन कों जीने का क्यों अब तक नही मिला है |
                  (१)
डोले भी इनके मंगवाएँ, और कोठों पर भी पहुंचादी |
जब इसने होठ हिलाए तो,दीवार में जिन्दा चुनवादी |
खामोश देखिये कहता हूँ,अब हरगिज़ नही रहूँगा |
फांसी पर भी लटकादो तुम,फिर भी यही कहूँगा |
सबसे बड़ा दुश्मन इनका,दिल्ली का लाल किला है |
                  (२)              
ठोकर से इसको ठुकरादी,और हिस्सों में भी बांटी है |
जब इसने प्यार जगाया तो,फिर नाक भी इसकी काटी है |
दासी सा व्यव्हार किया और जुएँ में भी हारी |
भरी सभा में हम लोगों ने जबकि इसे उघारी |
अपनी अपनी कुर्सी से,कोई तिल भर नहीं हिला है |
                  (३)
सूखे में हमें सुलाये है,ये खुद गीले में सोयी है |
कांटा जब लगा हमारे तो,यह फूट फूट कर रोई है |
पहलें हमने अग्नि परीक्षा तक इससे दिलवादी|
उसके बाद  फिर धक्के देकर घर से इसें भगादी |
बोलो इनके अहसानों का क्या बस् यही सिला है |
--------------अनिल उपहार --------------------
------मुक्तक ------
------- ------- -------
समन्दर  गम  का  गहरा  था  किनारा  मिल  गया  मुझको |

राह  दुर्गम  थी  अंधियारी  सितारा  मिल गया  मुझको  | 

ज़माने  भर  की खुशियों  से  नवाज़ा  इस तरह  उसने  |

बुजुर्गो  की  दुआओं का  सहारा  मिल  गया  मुझको  |

------------------ -------अनिल उपहार ----------------

Monday, February 3, 2014

------इस बसंत -----
-----------------------

सांसो  के  मधुबन  में  अब  भी 

गीत  कुंलाचे  भरते  रहते  |

छंद  और  व्याकरणी  पैमाने  

नव  सृजित  अनुप्रास  से  बहते |

हर  प्रतीक्षा  आगमन  की  

राह  सी  दिखती  रही  |

द्वार  आँगन  देहरी  संग 

मधुमास  पल  लिखती  रही |

धडकनों  की  पालकी  से 

हर बार  मन  तुमको  निहारे   |

गीत  कविता  छंद  ही  क्या 

खुद  गज़ल  तुमको  सँवारे  |

नेह  निमंत्रण  तुमको  है 

नव गीत  अधर  पर  तुम  रख दो |

जीवन  के  रेखा चित्रों  में  

आकर  बासंती  रंग  भरदो |

---------अनिल उपहार ----------- 


Sunday, February 2, 2014


-----मुक्तक ---
-----------------
चेहरा  पूनम  के  चाँद  जेसा   है  |

जिस्म  सारा  गुलाब  जेसा  है  |

सुर्ख  होठों  पे  छलकते  प्याले  |

नशा  इनमें  शराब  जेसा  है  

-------अनिल उपहार ---------
  mahila  sangeet  ka sanchalan  karte  hue.................

  ------मुक्तक------
-----------------------

दर्द   में  जब  से  संवरना   सीख  लिया  |

शब्दों  ने  कागज़  पर  उतरना  सीख  लिया  |

खुद  ही  हाथों  से  कलम  कैसे  छीन  लेता  में,

हरेक  अदावत  पर  मोहब्बत  ने  निखरना  सीख  लिया  |

--------------अनिल उपहार -----------
 

Tuesday, January 28, 2014


Bakani  Kavi  Sammelan  ka  Sanchalan  karte  hue.........
-----मनुहार ------
-------------------------------
कुदरत  ने  भी  देखो  यारों  

अज़ब  ये  प्रीत  बनाई  |

|

-
-         - विश्वास----
-----------------------------

मिले  है  तो  आगे  भी  मिलते  रहेंगे  |

चरागे  मोहब्बत  भी  जलते  रहेंगे  |

खत्म  होगा  नहीं  सिलसिला  ये  मिलन  का,

फलसफे  जिंदगी  के  बदलते  रहेंगे  |

----------- -------- --------- ------------ 
--------बेटी --------
--------------------
जिंदगी   की  महकती  एक  गंध  है  बेटी  |

कमनीयता  का  सलोना  एक  छंद  है  बेटी |

त्याग  और  बलिदान  के  इतिहास  में,

सेवा  समर्पण  से  जुड़ा  अनुबन्ध  है  बेटी  |


खिले  गुलाब  की  मधुर  एक  पांखुरी  है  बेटी  |

मधुरिम  है  जिससे  जीवन, वह माधुरी  है  बेटी  |

ज़ख़्मी  कलेजे  से  भी, बेदर्द  ज़माने  कों ,

मीठे  सुनाती  नगमें,  वह  बांसुरी  है  बेटी  |

रिश्तों  की  देहरी  पर,  दीप  प्रीत   के  धरे  |

सम्बन्धों  कों  विस्तार  दे, वह  धुरी  है  बेटी |

किलकारियों  से  गोद  भरने  को  ज़माने  की  |

आज  तक  मिटती  रही,  वह  कस्तूरी  है  बेटी  |

-----------        ----------    ----------- --------

Monday, January 27, 2014

जोड़ कर दोनों हाथों कों श्रद्धाओं के,
तुझको करता हूँ अर्पित सुमन शारदे |
दास चरणों का अपने मुझे जानकर 
करले स्वीकार मेरा नमन शारदे |
             (१)
 चाहे लेखक या शायर हो चाहे कवि 
तेरी नज़रों में हें ये बराबर सभी |
ले के कन्या कुमारी से कश्मीर तक,
हें ये तेरा ही सारा चमन शारदे |
            (२)
प्यार मुझको मिला और जो शोहरत मिली 
सच तो ये हें की तेरी बदोलत मिली |
तू जो करदे करम तो चमक जाऊंगा,
ऐसा कहता हें अब मेरा मन शारदे |
            (३)
ये दिखावा नही मेरा ईमान है 
जान में जब तलक भी मेरे जान है |
गीत प्यारो मोहब्बत के मैं गाऊंगा,
दे रहा हूँ में तुझको वचन शारदे 
----------------------------
              ( अनिल उपहार )
|

                   ---          -                                                                                          -----  बहन का अधिकार------

 जो झपट रहें है कुर्सी पर उनसे ये मेरा गिला है |     
अधिकार बहन कों जीने का क्यों अब तक नही मिला है |
                  (१)
डोले भी इनके मंगवाएँ, और कोठों पर भी पहुंचादी |
जब इसने होठ हिलाए तो,दीवार में जिन्दा चुनवादी |
खामोश देखिये कहता हूँ,अब हरगिज़ नही रहूँगा |
फांसी पर भी लटकादो तुम,फिर भी यही कहूँगा |
सबसे बड़ा दुश्मन इनका,दिल्ली का लाल किला है |
                  (२)              
ठोकर से इसको ठुकरादी,और हिस्सों में भी बांटी है |
जब इसने प्यार जगाया तो,फिर नाक भी इसकी काटी है |
दासी सा व्यव्हार किया और जुएँ में भी हारी |
भरी सभा में हम लोगों ने जबकि इसे उघारी |
अपनी अपनी कुर्सी से,कोई तिल भर नहीं हिला है |
                  (३)
सूखे में हमें सुलाये है,ये खुद गीले में सोयी है |
कांटा जब लगा हमारे तो,यह फूट फूट कर रोई है |
पहलें हमने अग्नि परीक्षा तक इससे दिलवादी|
उसके बाद  फिर धक्के देकर घर से इसें भगादी |
बोलो इनके अहसानों का क्या बस् यही सिला है |
--------------अनिल उपहार --------------------

Thursday, January 23, 2014

        
        मुक्तक 
------------------
तुम  कृति  सुन्दर  धरा  की,  

शांती  की रस  धार  हो  |

विरह  गीत  के  छंद  जैसी , 

तुम  करुण  मनुहार  हो  |

कह्दूं  रुबाई  मीर  की  या, 

गज़ल  ग़ालिब  की  तुम्हें  |

तुम  मधुर  वीणा  सजन  की,

प्रणय  का  श्रृंगार  हो  |

-------अनिल  उपहार  ------ 


                    मुक्तक 
                   ------------

इक  बार  मुझे  तुम  छू  लेते 

तो  यह  तन  चन्दन  हो  जाता  |

द्वार  द्वार  महका  होता  

आँगन  वृन्दावन  हो  जाता  |

शब्दों  कों  मिलती  ऊँचाई  

रिश्तों  का अर्थ  बदल  जाता  |

तेरी  सांसो  की  खुशबू   से 

घर  मेरा  मधुबन  हो जाता  |

---------अनिल -उपहार -----

                                  मुक्तक  
                                  ----------
                मैं  छंद  बना  और  तू गीत  होगई |

               रिश्तों  की  नर्म  डोर  बंधी  प्रीत  होगई  |

                सन्दर्भ  बदलता  रहा  रस्मों  रिवाज़  का ,

                मैं  मीत  बना  और  तू  मन  मीत  होगई  |

                               ------------अनिल उपहार ------------

Tuesday, January 21, 2014

                     गज़ल  
                   -----------
मैं गज़ल कहता हूँ, तुम हाथ उठाये रखिये
अपनी अंगडाई कों,मेहराब बनाये रखिये |

सोंचता हूँ मैं तेरी मांग में तारे भर दूँ 
मेरी तसवीर कों सीने से लगाये रखिये |

मेरा वादा है मैं आऊंगा जरुर आऊंगा 
तुम तो बस घर के चरागों कों बुझाये रखिये |

तुम मेरी और जो देखोगे तो मर जाऊंगा 
बस मेरे सामने पलकों कों झुकाये रखिये |

तेरे हाथों से मेरे दिल कों सुकूं मिलता है 
दो घड़ी तुम मेरे सीने कों दबाये रखिये |

तुमको बदनाम ना करदे ये जमाने वाले 
ऐसे लोगों से तुम अब खुद कों बचाये रखिये |
------ ----- ----- (अनिल उपहार )
            'काव्यांजलि' पिडावा (राजस्थान) 

                    गज़ल 
                  -----------
उनके सियाह बालों में अब भी महक तो हें 
बस् सिर्फ रंग बदला हें लेकिन चमक तो हें |

में क्या बताऊ अब मेरे महबूब कि कमर 
पतली नहीँ तो क्या हुआ उसमे लचक तो है |

हम जैसे बद नसीबों कों यारों जहान में 
जीने का हक नही तो मरने का हक तो है |

मिलने कों बेक़रार हें कंगन से चुडियां  
 माना ये दोनों दूर है फिर भी खनक तो है |

माना कि उनका रंग हें उपहार सांवला 
सब कुछ हें फिर भी चेहरे के उपर नमक तो है |
          ---------(अनिल उपहार ) 
                    गज़ल 
                   ----------
आज कि रात जुबाँ पर ना लगाओ ताले 
वरना बदनाम हमे कर  देंगे दुनिया वाले |

रात दिन दिल में यही फिक्र लगी रहती है 
जान ले ले ना मेरी ये तेरे गेसू काले |

दिल में हसरत हें यही में तेरा दीदार करूं 
भेज कर खत मुझे इक बार तो घर बुलवाले |

तेरे कदमों में मैं खुद कों भी निछावर कर दू 
आजा आजा मेरी तकदीर बदलने वाले |

मैं ये समझूंगा मेरी जीत यकीनन होगी 
अपने उपहार कों इक बार जो तू अपनाले |
             ------(अनिल उपहार)------
   हाँ ये औरत है 
-------------------------

रोज की भागम भाग,
सीने में दबाये दहकती आग 
वक़्त की मार,
तानों की बोछार,
दोहरी जिंदगी कों 
ढो रही सदियों से |
अपनों से छली गई,
तंदूर में तली गई,
समर्पण की त्रासदी कों 
कब तलक पीती रहेगी ?
हाँ 
यह औरत है |
सब कुछ सहती रहेगी |
बीबी किसी की 
बेटी किसी की 
बहन किसी की 
सब कुछ लुटाकर 
अपनों के बीच 
खुद कों मिटाकर 
देहरी के दीप सी 
जलती रहेगी |
हाँ 
यह औरत है 
सब कुछ सहती रहेगी |
----(अनिल उपहार )
'काव्यांजलि' पिडावा जिला 
झालावाड (राज.)326034
 --- कविता ---
 ---------------

मैं नहीं जानता 
विचारों की गहराई,
असीमित भावों का 
विशाल शब्द कोश |
पर हाँ,
इतना अहसास आज भी 
जिन्दा है 
अंतर मन में कहीं |
कविता,
अभिव्यक्ति के उच्छ्रंखल आँगन 
में 
नहीं खेलती |
वो पल पल निखरती है 
शब्दों के सागर में,
संवरती है तहज़ीब के लहज़े में,
बस् सिखाती है 
भाषा में आदमी होने की तमीज़ |
----अनिल उपहार ---
                   गज़ल 
               -------------

तुम बिन हें सूनी सूनी मेरे दिल की ये राहें |
सावन में  भी जलाती हें खामोश निगाहें |

माना कि बहुत दूर हें तू मेरी पहुँच से 
बैचेन बहुत करती हें पर तेरी निगाहें |

जो कर रहे है प्यार उसे सारी जिंदगी 
दोनों ही निभाने कि कसम बैठ के खाए |

तुम घर बसा के अपना कहीं पर भी जाइये 
लेकिन रहेगी साथ तेरे मेरी दुआए |

तू आरजू हें मेरी तो  में आरजू तेरी |
चाहत कि हरेक रस्म निभाती हें निगाहें |

दो चीज जिसके पास हें वो खुश नसीब है 
आशीर्वाद बाप का और माँ कि दुआए |

जो जख्म मिले हमको वो ताजा हें आज भी 
लेकिन ये शर्त हें कि किसी कों ना दिखाए |
              ----   -----  -----
                      ( अनिल उपहार )

सरस्वती वंदना

             सरस्वती वंदना 
            ------------------------
जोड़ कर दोनों हाथों कों श्रद्धाओं के,
तुझको करता हूँ अर्पित सुमन शारदे |
दास चरणों का अपने मुझे जानकर 
करले स्वीकार मेरा नमन शारदे |
             (१)
 चाहे लेखक या शायर हो चाहे कवि 
तेरी नज़रों में हें ये बराबर सभी |
ले के कन्या कुमारी से कश्मीर तक,
हें ये तेरा ही सारा चमन शारदे |
            (२)
प्यार मुझको मिला और जो शोहरत मिली 
सच तो ये हें की तेरी बदोलत मिली |
तू जो करदे करम तो चमक जाऊंगा,
ऐसा कहता हें अब मेरा मन शारदे |
            (३)
ये दिखावा नही मेरा ईमान है 
जान में जब तलक भी मेरे जान है |
गीत प्यारो मोहब्बत के मैं गाऊंगा,
दे रहा हूँ में तुझको वचन शारदे 
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              ( अनिल उपहार )
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          ---अनिल उपहार --- 

                   
                                 गज़ल 
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तुम बिन हें सूनी सूनी मेरे दिल की ये राहें |
सावन में  भी जलाती हें खामोश निगाहें |

माना कि बहुत दूर हें तू मेरी पहुँच से 
बैचेन बहुत करती हें पर तेरी निगाहें |

जो कर रहे है प्यार उसे सारी जिंदगी 
दोनों ही निभाने कि कसम बैठ के खाए |

तुम घर बसा के अपना कहीं पर भी जाइये 
लेकिन रहेगी साथ तेरे मेरी दुआए |

तू आरजू हें मेरी तो  में आरजू तेरी |
चाहत कि हरेक रस्म निभाती हें निगाहें |

दो चीज जिसके पास हें वो खुश नसीब है 
आशीर्वाद बाप का और माँ कि दुआए |

जो जख्म मिले हमको वो ताजा हें आज भी 
लेकिन ये शर्त हें कि किसी कों ना दिखाए |
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                      ( अनिल उपहार )
                              बेटी                                  

 जो झपट रहें है कुर्सी पर उनसे ये मेरा गीला है |
अधिकार बहन कों जीने का क्यों अब तक नही मिला है |
                  (१)
डोले भी इनके मंगवाएँ, और कोठों पर भी पहुंचादी |
जब इसने होठ हिलाए तो,दीवार में जिन्दा चुनवादी |
खामोश देखिये कहता हूँ,अब हरगिज़ नही रहूँगा |
फांसी पर भी लटकादो तुम,फिर भी यही कहूँगा |
सबसे बड़ा दुश्मन इनका,दिल्ली का लाल किला है |
                  (२)              
ठोकर से इसको ठुकरादी,और हिस्सों में भी बांटी है |
जब इसने प्यार जगाया तो,फिर नाक भी इसकी काटी है |
दासी सा व्यव्हार किया और जुएँ में भी हारी |
भरी सभा में हम लोगों ने जबकि इसे उघारी |
अपनी अपनी कुर्सी से,कोई तिल भर नहीं हिला है |
                  (३)
सूखे में हमें सुलाये है,ये खुद गीले में सोयी है |
कांटा जब लगा हमारे तो,यह फूट फूट कर रोई है |
पहलें हमने अग्नि परीक्षा तक इससे दिलवादी|
उसके बाद  फिर धक्के देकर घर से इसें भगादी |
बोलो इनके अहसानों का क्या बस् यही सिला है |
--------------अनिल उपहार ---------------------
आस्था, आलम्बन ,विश्वास,
सदियों  से  यही  तो  चाहा  था,
तुमसे  इस  समाज  ने |
कभी  तुम  ययाति  की  बेटी 
माधवी  बन ,उत्सर्ग  करती  रही |
कभी  त्रेता  की  रेणुका  बन,
नही  पूछ  पाई  कोई  प्रश्न 
अपने  पति  या  पुत्रों  से |
कभी  तुम  अहिल्या  बन,
युग  युगों  तक  इन्द्र  के  पाप  का 
दण्ड  भोगती  रही-
जबकि  जानते  थे  सब,
की  तुम  छली  गई  हो,
द्रोपदी  के  चीर  हरण  से  लेकर 
सामूहिक  बलात्कार  कांड  तक |
हर  बार  तुम्हीं होती  रही,
सामाजिक  एवं  मानसिक  रुग्णता  की 
         शिकार |
तुम्हारी  इस  दशा  के  लिए 
आखिर  कौन  है  जिम्मेदार ?
समाज  की  सामंत  वादी  सोच 
          या 
सुन्न  पड़ी  संवेदना |
कभी  तुम  कबीर  की  वाणी  का 
आधार  बनी,
तो  कभी  जायसी  के  स्वच्छंद  प्रेम 
की  अभिव्यक्ति-
फिर  भी  ,हर  बार  तिल  तिल  कर 
मरती  रही  हो  तुम, और 
यह  समाज  हर  बार  शब्दों  के  मरहम  से 
भुनाता  रहा  तुम्हें |
निर्भया  |तुम्हांरी  मौत  ने 
खड़े  किये  है  अनेक  सवाल |
वो  सारे  प्रश्न है  आज  भी 
अनुत्तरित |
जो  शाश्वत, सार्वभौमिक, और  सर्वकालिक 
उत्तर  अवश्य  ही  ना  बन  पाए |
इन्हीं  में गुम  है  तुम्हारी  रूह  के 
ताज़ा  ज़ख्म,
जो  बयां  कर  रहें  है- 
औरत  होने  की  अंत  हीन  पीड़ा  कों |
-----अनिल उपहार -------

---             -     स्मृति  ---

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जीवन जल उलीचती 
तुम्हारी यादें,
 देह की हर दस्तक में 
घोल रही है मिठास |
मुझे याद है,
तुम्हारी वो पहली चिठ्ठी -
उसका हर एक हरफ,
महक रहा है आज भी 
तुम्हारी खुशबू से |
मुझे याद है,
तुम्हारे हाथों की वो सुर्ख 
मेहंदी, 
जिस पर लिखा था मेरा नाम,
ठीक उसी तरह,
जैसे नये वर्ष की अगवानी में 
कोई नव यौवना 
लिख रही हो प्रेम का अध्याय 
शुभाशंषा की तरह |
--------अनिल उपहार ------