Monday, December 26, 2016
Sunday, December 25, 2016
Uski गली
उसकी गली से जब भी गुजरना पड़ता है ।
तूफानों की ज़द से गुज़रना पड़ता है ।
ज़ख्म सभी ताज़ा है अब तक सीने में
अरमानों को रोज़ निगलना पड़ता है ।
अनिल उपहार
Saturday, December 24, 2016
रूप की धूप
रूप की धूप कहें या भीगे हुए जज़्बात कहें ।
सूरज से नज़र मिलाती हँसी मुलाकात कहें ।
गहनता है संस्कारों की अधरों से बयाँ होती है
रुबाई मीर की कहदें या खुदा की करामात कहें ।
अनिल उपहार
Thursday, December 22, 2016
सीख ।।।।।।।।
माना तुमको मज़हब से भी ,ज्यादा प्यारा प्यार रहा ।
भौतिकता की चकाचौंध में , बस तेरा कारोबार रहा ।
पुरखों की विरासत का भी ,मान नही रख पाई तुम
अपनी शोहरत की भी सच में ,लाज नही रख पाई तुम
नाम भले ही कैसा भी हो ,कर्म याद कर लेना था ।
जिसने तुमको मान दिया ,सम्मान याद रख लेना था ।
अनिल उपहार
Saturday, December 17, 2016
संबंधो के गुलमोहर
तुम चाहते थे
प्रकाश की मानिंद
आधुनिकता को ओढ़ लेना ।
और मैं
परम्परा को धरती की तरह
बिछाता रहा ।
चुभने लगी
घोर अभावों की सुइयां
संबंधो के गुलमोहर
रोज़ खिलते थे
आश्वासनों के गमलो में ।
कोई किरदार फिर हो उठता
जीवंत
समेटने लगता निश्चलता के
बिखरे पन्नों को ।
और उम्मीदों की चौखट ,
गहरी संवेदना को
पढ़ती रहती
प्राक्कथन की तरह ।
अनिल उपहार
Monday, December 12, 2016
मुक्तक
अनछुए सब पहलुओं का वो बड़ा फनकार क्यूँ है ।
है बहुत कमसिन मगर खामोश सा किरदार क्यूँ है ।
इन वफाओं का चलन भी खो गया तन्हाइयों में
सब देखकर के यूं लगा ये ज़िन्दगी दुश्वार क्यूँ है ।
अनिल जैन उपहार
Saturday, December 10, 2016
कविता
अपलक निहारती
क्षितिज के उस पार
बीते हुए साल की
सहेजी हुई यादों कों
खामोशियों की पगडंडी ।
शीत में उष्णता का
अहसास कराती
तेरे चुपचाप चले जाने की वज़ह ।
और मैं
नन्हें से किरदार की तरह
रिश्तों के रंगमंच पर
कर रहा होता हूँ
मिलन के अदभुत पलों का
जिवंत अभिनय ।
अनिल जैन उपहार
मुक्तक
गुज़रे लम्हों के साये में बैठे मन में आंच लिए ।
ख़त तुमने लिक्खे थे जो भी अक्षर अक्षर बांच लिए ।
धुंधली होगई सारी लिखाई और स्याही भी थी फीकी
नज़रों ने सारे ही उत्तर एक पल में ही जांच लिए ।
अनिल जैन उपहार
Saturday, November 5, 2016
सफर मुक्तक
सफर हम तय भी कर लेते जो होता साथ तू मेरे ।
मिटा देते हम हर एक फासला जो होता साथ तू मेरे ।
ज़माने की रवायत को भी पीछे छोड़ आते हम
कदम तो खुद बढे जाते जो होता साथ तू मेरे ।
अनिल उपहार
Friday, November 4, 2016
मुक्तक
भारत माता सिसक रही है सरहद की लाचारी पर ।
और विवश है ज़र्रा ज़र्रा दोगली तैयारी पर ।
खून बहाया बेटो ने बलिदान व्यर्थ नही जायेगा ।
सिर्फ राख छाई है थोड़ी धधकती चिंगारी पर ।
अनिल उपहार
Friday, September 2, 2016
Tuesday, August 30, 2016
दाना माझी घटना
आज धूमिल हर स्वप्न हो गया बापू तेरे देश का ।
शर्मसार है ज़र्रा ज़र्रा आधुनिक परिवेश का ।
मानवता की लाश लिए वो खुद कांधे पर निकल पड़ा
देख रहा आवाम यहाँ अंजाम सियासी ऐश का ।
अनिल उपहार ।।।।।
Saturday, August 20, 2016
सिंधु की जीत पर
सिंधू तुम नही हारी हो अब स्वर्णिम युग की बारी है ।
पूरा भारत नाज़ करेगा सचमुच वो तैयारी है ।
सिल्वर के तमगे के आगे सोना लगता फीका है
बिटिया तेरी उपलब्धि पर ये भारत बलिहारी है ।
अनिल उपहार
Thursday, August 18, 2016
रक्षाबंधन
हर बार तुमने
मेरी सूनी कलाई पर
अपने स्नेह के हस्ताक्षर कर
अपनी दुआओ के तमाम दस्तावेज
मेरे नाम कर दिए ।
और मैंने भी रवायतो के खाली
प्रष्ठ पर अपनी जेब के कुछ पल
तुम्हारी हथेली पर रख
अपने फ़र्ज़ की इति श्री कर ली ।
क्या सही अर्थों में
निभा पाया हूँ मै तुम्हारे स्नेह के
मुल्य कों ?
आज के इस पवित्र दिन
मेरे हाथों में बंधे इस धागे की कसम
मेरा वचन है तुम्को
की अब कोई बहन अपने भाई से
नही मांगेगी रक्षा का वचन ।
हर भाई ठीक मेरी ही तरह
निभाएगा हर वो फ़र्ज़
जिस पर सिर्फ बस सिर्फ बहन
तुम्हारा ही हक होगा ।
और दूर चौराहों पर तुम कर सकोगी
बेखोफ विचरण
हजारो की भीड़ में और हर वक़्त
खड़ा पाओगी किसी भाई को अपने
साथ ।
-----------अनिल उपहार --------
Monday, August 15, 2016
सूनापन
मलयानिल की मन्द समीर
जब छूकर गुज़रती थी
उस के अहसास को
तो रोम रोम एक अज़ीब सी
महक से महक उठता था ।
अपनी गुरुता का नही था
उसे कोई गुरुर
निश्छल और उदार मन
उसकी वैचारिक दक्षता पर
सहज हस्ताक्षर से
प्रतीत होते थे ।
अहम और बनावटी
मसालेदार
वाक्य विन्यास
उसके शब्दकोश में
थे ही नहीं ।
यथार्थ के जिवंत दस्तावेज
पर
वक़्त के कैनवास को
रंग भर
सजीवता प्रदान करना
बखूबी आता था उसे ।
और अचानक एक दिन
अविश्वास की अमिट स्याई ने
उसके अंतर्मन को झकझोर
कर रख दिया ।
बेबाक़ बयानी शांत होगयी
निःशब्द होगया वो
और ढह गया
संबंधो का विशाल सेतु
जो जोड़ता था
मन और विश्वास के रिश्तों को ।
शायद किसी कल्पना के पंखों से
भर पाये वो उड़ान
और नवगीत सा उतर आए
समृति के धुंधले पृष्ठों पर ।
अनिल उपहार ।।।।
Sunday, August 14, 2016
स्वतंत्रता दिवस
मेरा हर गीत सारे छंद आजादी तुम्हारे नाम ।
फ़िज़ा में तैरती हर सांस आजादी तुम्हारे नाम ।
साँसों की हवा देकर के फहराया तिरंगा था
सारे जश्न हर्षोल्लास आजादी तुम्हारे नाम ।
अनिल उपहार ।।।।
Thursday, August 11, 2016
रियो खेल
निकल कर चाह आँखों से वो बन अश्रु बही होगी ।
विषमता मन की सांसों ने यूँ धड़कन से कही होगी ।
सियासत के जटिल है दाव रिसते घाव कहते है
हमारी खेल नीति में कमी कुछ तो रही होगी ।
अनिल उपहार ।।।।
Wednesday, August 10, 2016
मुक्तक (खेल)
निकल कर चाह आँखों से अश्रु बन बही होगी ।
विषमता मन की सांसों ने धड़कन से कही होगी ।
सियासत के जटिल है दाव रिसते घाव कहते है
हमारी खेल नीति में कमी कुछ तो रही होगी ।
अनिल उपहार ।।।।
Sunday, August 7, 2016
क्या यही प्यार है (मुक्तक)
मित्रता दिवस पर
महक जाये धरा मन की मैं ऐसा इत्र लाया हूँ ।
अदब और संस्कारों से सजा वो चित्र लाया हूँ ।
डिगा सकते नही जिसको चलन भी दोगलाई के
रखे महफूज़ दिल में राज़ ऐसे मित्र लाया हूँ ।
अनिल उपहार
Thursday, August 4, 2016
विरहन (कविता)
राह निहारते व्याकुल नयना
बाट जोहती मन देहरी
अधरों पर छाई ख़ामोशी
क्या तुमको नही दिखती ।
ओ प्रियतम
उदास पड़े सावन के झूले
काहे को विरहन को भूले ।
सिसक रही हाथों की महंदी
बेबस तुम बिन तीज भी
और मैं
तक रही हूँ हर और से आती आहट को
कि लौट आओगे तुम
और भर लोगे अपने आगोश में ।
बस प्रतीक्षा में तुम्हारी
लिख रही हूँ
मन के कोरे पृष्ठों पर
विरह के गीत
कि आओगे तुम
और दोगे उन्हें अपने स्वर ।
अनिल उपहार
Friday, July 29, 2016
मुक्तक
अमृत के घट रीते सारे ,बस किस्मत का मारा हूँ ।
विषयों के बंधन ने जकड़ा ,तोड़ न पाया कारा हूँ ।
दम्भ दलन करने वाली वो,लड़ियाँ पल पल टूट गई
काँटों से तो जीत गया था ,पर फूलों से हारा हूँ ।
अनिल उपहार
Tuesday, July 26, 2016
अब्दुल कलाम
अब्दुल कलाम तुझे देश का सलाम जग ।
योगदान तेरा कभी भूल नही पायेगा ।
मिसाइल मेन तूने दिया विज्ञान उसे
युवाओं का मन नित हर पल भुनायेगा ।
सादगी बनी थी पर्याय अखिल विश्व में
सोन चिरैया के पंख कौन सहलायेगा ।
बात गर होगी विश्व गुरु की पटल पे तो
जग सारा भारती के आगे झुक जायेगा ।
अनिल उपहार
Saturday, July 23, 2016
मुक्तक(बेटी)
ज़िन्दगी की महकती एक गंध है बेटी ।
कमनीयता का सलोना सा छंद है बेटी ।
त्याग और बलिदान के इतिहास में
सेवा समर्पण से जुड़ा अनुबंध है बेटी ।
अनिल उपहार
Friday, July 22, 2016
तेरी रहमत की बारिश (मुक्तक)
तेरी रहमत की बारिश से घर मेरा समंदर है मौला ।
पंख दिये है उम्मीदों के मन मस्त कलंदर है मौला ।
जो भी मिला अपनी किस्मत का ये कर्मो की माया है
फिर कैसे फरियाद करें जब वक़्त सिकंदर है मौला।
---------अनिल उपहार ----------
Monday, July 18, 2016
मुक्तक(मन हुआ)
मन हुआ छोटा बहुत पर कामना मरती नही ।
तन भले ही साथ ना दे वासना मरती नहीं ।
सांस जब अपनी नही किस बात का गुमान फिर
धन बहुत है पास लेकिन लालसा मरती नहीं ।
अनिल उपहार
Friday, July 15, 2016
दोहे
अम्बर भी धोने लगा चरण धरा के आज ।
पावस का ख़त पढ़ चला खोल पपीहा साज ।
नित परिधान बदल रहा देखो बादल आज ।
बून्द बून्द ने छेड़ दिए मन के सारे साज ।
अनिल उपहार
Thursday, July 14, 2016
ओ शिल्पी (कविता)
ओ शिल्पी
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, ,,,,,,,,,,
कोई नन्हा सा किरदार था
वो रिश्तों के रंगमंच का ।
जीवन के सुख दुःख
देखे थे बहुत करीब से उसने ।
एक शिल्पी सा तराशना चाहता था वो
अनछुए पहलुओं कों ।
बनाना चाहता था
पत्थर को भी भगवान ।
उसकी बातों में था
अज़ीब सा सम्मोहन
सादगी और लावण्य का
पर्याय थी उसकी विनम्रता ।
अचानक आई वक़्त की
तेज आंधी ने
नफरत की ऐसी दिवार खड़ी करदी
जिसने सारे तिलिस्म कों
झकझोर कर रख दिया ।
किसी और दुनियां से आया
वो किरदार
गुमनाम बस्ती में कहीं खो गया
शायद फिर से लौट आए वो शिल्पी
और तराश जाये पत्थर को
भगवान की तरह ............,
अनिल उपहार
Tuesday, July 12, 2016
कविता(दम्भ)
दम्भ जब अपनी हद से
लगता है गुजरने
वो नही देखता
ऊँच नीच
अपना पराया ।
वो तो बस चाहता है
हरदम
मर्यादा की दहलीज़ को लांघना
और कर देना चाहता है साबित
अपनी झूटी दलीलों से
खुद का ही हलफनामा ।
टांग कर
सच्चाई को सलीब पर ।
अनिल उपहार
Sunday, July 10, 2016
मुक्तक (आज फिर से)
आज फिर से दुआओ में असर आया है ।
चाँद फिरसे मेरे आँगन में उतर आया है ।
पढ़ तो लेता मैं उसे शोख़ निगाहों से मगर
अक्स जैसे कोई आँखों में उभर आया है ।
अनिल उपहार
Saturday, July 9, 2016
मुक्तक लगी दिल की
लगी अपने दिल की बुझाने चला हूँ ।
तुम्हें हाले दिल मैं सुनाने चला हूँ ।
जुदाई के लम्हे वो फुरकत की रातें
तुम्हे दिल के किस्से सुनाने चला हूँ।
अनिल उपहार
Friday, July 8, 2016
मुक्तक हादसों से
हादसों से ही सदा मैं तो पला हूँ ।
राह में अक्सर अकेला ही चला हूँ
ठोकरे खाई बहुत अपनों के हाथो
तुम्हे दिल के किस्से सुनाने चला हूँ।
अनिल उपहार
Thursday, July 7, 2016
मुक्तक
दर्द तो जाता रहा अब ना रहा कोई गिला ।
अश्क आँखों ने पिये थे जख़्म भी खुद ही सिला ।
वक़्त की आंधी में फिर भी दीप सा लड़ता रहा
आपके इस प्यार से ही हौंसला हमको मिला ।
अनिल उपहार
Wednesday, July 6, 2016
मुबारकबाद
ईद की हार्दिक शुभ कामनाये ।
भुलादो सब गिले शिकवे मुबारक ईद हो तुमको ।
रहे ना फासला दरम्यां मुबारक ईद हो तुमको ।
सिवइयों की तरह घुल जाये ज़हनों में हमारे भी
ज़ुबाँ पर बस घुले मिश्री मुबारक ईद हो तुमको ।
अनिल उपहार
मुक्तक
मिले थे ज़ख्म उल्फत में कहानी याद आती है ।
पली बरसों से आँखों में रवानी याद आती है ।
तुम्हारी इक छुअन से होगई थी देह वृन्दावन
तुम्हारे प्यार की पहली निशानी याद आती है ।
अनिल उपहार
Tuesday, July 5, 2016
मुक्तक
सब दलीले व्यर्थ थी बस फैसला बाकी रहा ।
कटघरे में खुद खड़ा था हौसला बाकी रहा ।
मज़हबी उन्माद में उलझा रहा वो इस कदर
बस हमेशा दो कदम का फासला बाकी रहा ।
अनिल उपहार
Monday, July 4, 2016
बेबसी(कविता)
दरख़्तों पर पड़ी
बारिश की पहली बून्द ने
नन्ही कोंपल के बदन पर
सुरमई हस्ताक्षर क्या किये
उसका पोर पोर
किलकारियों से गूंजने लगा ।
ठीक उसी तरह
तुम्हारी देह के किसी कोने में
मेरी आहट पा ख़ुशी से सराबोर
होगई थी तुम
लेकिन मेरा होना
तुम्हारी इच्छाओ को लील गया
और मेरे जनक की रूढ़िवादी
विचार धारा ने तुम्हारी ममता को
तार तार कर दिया ।
छोड़ आई तुम मुझे अपनी ममता से
दूर
और कर दिया
शांत खामोश सदा के लिए ।।।।।।।
अनिल उपहार
Thursday, June 30, 2016
मुक्तक
भागफल सा प्यार तुम्हारा और गुणक सी तेरी जुदाई ।
समीकरण सा तेरा मिलना योगफल सी बनी खुदाई ।
हासिल सा तेरा रूठ के जाना और व्याकरण भी गहरा है
रिश्तों के इस अंक गणित को भोली आँखें जान न पाई ।
-------------अनिल उपहार -------
गीतिका
मैंने कितनी रातें काटी
तुम पर कोई गीत लिखूं ।
उजियारों की चौखट चूमी
तुमसा ही मन मीत लिखूं ।
द्वार द्वार आँगन देहरी पर
मैंने वंदनवार सजाए ।
कलम डुबोई आँसुओ में
नित शब्दों के अर्घ चढ़ाए ।
अर्थ खोगए व्याकरणी पैमाने
किन शब्दों में रीत लिखूं ।
मन से मन का मिलन करा दे
सचमुच ऐसी प्रीत लिखूं ।
--------अनिल उपहार -------
कविता
संस्कार विहीन होता परिवेश
और मर्यादा खोरहा आज का
युवा
रिश्तों के अंक गणित कों
क्या समझ पायेगा
और दाग दार होते दामन कों
किस तरह बचायेगा ।
उलझे है कुछ सवाल
जो चाहते है समाधान ।
क्या ????कोई देगा जवाब ।।।।।
------अनिल उपहार ---
मुक्तक
लिखी पाती ये असुवन से सजन तुम लौट आना फिर ।
तेरे चरणों की हूँ दासी न इतना भूल जाना फिर ।
तेरे हर फ़र्ज़ को दिल से सलामी देती हूँ सुनले
मेरे इस प्यार के आगे न अपने पग डिगाना फिर ।
--------अनिल उपहार -----
मुक्तक
मेरे हर गीत का अंदाज़ ओ आगाज़ है तू ।
मेरी सांसों में जो खनके वो मधुर साज है तू ।
तुझसे सीखा है हुनर मैंने लिखने पढने का
तू ही किरदार है मेरा मेरी आवाज़ है तू ।
---------अनिल उपहार ------
कविता
रिश्तों की पगडण्डी पर
चलते चलते
भौतिकता की फिसलन में
संभल नही पाते कदम
और आधुनिकता की
बैसाखियों में ढूंढते सहारा
क्या मंजिल तक
पहुंचा सकेंगे
कल्पना के पंख ।
परिंदों ने कहाँ सीखा
ये हुनर
आसमां ने तो नही की
कभी फिरका परस्ती ।
फिर हमने कहाँ से
सीख लिया
शून्य होती संवेदना का
गणित ।
शायद पढ़ लिया है हमने
संवाद हीनता का व्याकरण
तभी भूल गए हम अहसासो
की शब्दावली ।
-----------अनिल उपहार -------
कविता
पाती
-----------
मेरे आराध्य
मेरी शौहरत के हिमाला के
गुरु शिखर ।
तुमकों कैसे लिखूं
और
कैसे गाउँ गीतों में ।
जब जब भी गाता हूँ
आँखे बहने लगती है
झरने सी ।
कभी श्रद्धा भावनाओं के अर्घ
चढाने लगती है ।
तो कभी मन
अपनी अतल गहराई से
करने लगता है प्रेम का अभिषेक ।
और चाहता है
चरण वंदना कर
उस अलौकिक और मधुर अहसास को
जीना
जो मिला है मुझे पुण्य कर्मों से ।
यह सिर्फ निवेदन है अधिकार नही है मेरा ।।।।।
------अनिल उपहार ------
मुक्तक
पहली बार मिले थे हम तुम यार पता ज़िंदा रखना ।
जब जब हमने की है खताएं यार खता ज़िंदा रखना ।
हमने तो बस मांगी दुआएँ तेरी ही खुशहाली की
ग़म में भी मुस्काने की तुम यार अदा ज़िंदा रखना ।
--------------अनिल उपहार ----/-
मुक्तक
किये तुमसे जो वादे थे उन्हें बस तोड़ आये है ।
बिना बैसाखी के पीछे तेरे हम दौड़ आये है ।
वफ़ा की राह में कंकर मिले या फिर मिले कांटे
किसी के दर पे दिल की हर तमन्ना छोड़ आये है ।
--------अनिल उपहार
मुक्तक
खुदा के वास्ते उसको मेरा दिलदार लिख देना ।
यही है आरज़ू दिल की हँसी संसार लिख देना ।
सुनो शिल्पी तराशा तुमने देकर चोट पत्थर को
कभी तुम प्रीत लिख देना कभी मनुहार लिख देना ।
----------@अनिल उपहार
मुक्तक
दर्द लिख कर उम्र भर की दासता ढोते रहे ।
इक अदद मुस्कान को पहचान वो खोते रहे ।
अपने हिस्से की ख़ुशी भी रास न आई जिन्हें
शब्द के फनकार कवि भी प्यार कर रोते रहे ।
-------अनिल उपहार -----
मुक्तक
छंद कविता गीत की पहचान हो ।
शब्दावली हो प्रीत की यशगान हो ।
यूँ भले ही कह नहीं पाया ज़ुबा से
मैं ग़ज़ल हूँ मीत तुम अरकान हो ।
------अनिल उपहार -----
मुक्तक
ओ वीणापाणी आज ह्रदय के तारों को झंकृत करदो।
बैठो जीभ की जाजम पर हर इक शब्द अलंकृत करदो।
दौलत और ये शौहरत तो बस तेरी ही तो बदौलत है
मेरे गीत ग़ज़ल छन्दों को आओ आज पारिष्कृत करदो।
अनिल उपहार। ।।।।।
मुक्तक
ज़िन्दगी के गीत का वो अनछुआ किरदार है ।
हर्फ़ है वो प्यार का या इक मधुर तकरार है ।
हर सलीका था गजब जब तोड़ आया वो भरम
हर अदा कहने लगी ये प्यार का इज़हार है ।
अनिल उपहार
कविता
अरमानो की दहलीज़ पर
जलाते रहे हर बार
प्रतीक्षा के दीये
फ़िज़ा में घुली
स्वार्थ की गर्द
कर देती थी एक चुभन पैदा
किरकिरी सी
मन की आँखें
हो उठती थी लाल
एक अनचाहे दर्द से ।
शब्दकोश था विवश
नही कोई उपमा और
उपमान ।
अनुप्रास भी तो था अधूरा
कोई कैसे लिखता
टूट कर बिखर जाने की वज़ह ।
अनिल उपहार
Wednesday, June 29, 2016
महिला दिवस पर
महिला दिवस पर
-------------
यूँ कहने कों तो हर बार कराते रहे
मेरी महानता का बोध ।
पढ़ाते रहे भरोसे का पाठ
पर खुद नहीं कर पाए भरोसा मुझ पर
हर बार मेरे अस्तित्व पर लगाते रहे
प्रश्न चिन्ह ।
करते रहे मेरे वज़ूद को तार तार ।
जबकि जानते थे तुम कि
छली गयी हूँ मैं
शब्दों के मरहम से भुनाई जाती रही हूँ मैं ।
तुम ही गढ़ते रहे उपमान
सजाते रहे प्रतिमान
अपनी शब्दावलियों से ।
मैं थामे रही रिश्तों का व्याकरण
निभाती रही अपना धर्म
इस उम्मीद से कि तुम बनोगे मेरे विशवास
की बैसाखी
दोगे वही ओहदा सम्मान
जिसे गाते रहे हो तुम
अपने गीतों और कविताओं में
दे पाओगे ???????????
------अनिल उपहार ----/
कविता पगली
वह पगली
-------------
मर्यादा की दहलीज़ पर
रोज़ जलाती है वो दीया
अदब और संस्कारों का ।
उसके धवल परिधान
चिढ़ाते थे
चंद्रमा की शुभ्र ज्योत्स्ना कों ।
सूरज की पहली किरण
बिखेरती थी अपनी
स्वर्ण रश्मियाँ
उसके सूने आँगन में ।
उसकी कलम का एक एक शब्द
रचता था साहित्य के भव्य महल
और
हर शिखर उसकी छंदमाल से
हो उठता था अभिमंत्रित ।
उसकी बातों में था
गज़ब का सम्मोहन ।
हर कोई खिंचा आता था
उसको पढ़ने ।
उसे कहाँ था अहसास
खुद की गुरुता का ।
वो तो अनजान अल्हड
भरती रहती प्रकृति के रंग
अपनी कूँची से ।
लेकिन बोल उठता था उसका मौन भी
उसकी हर तस्वीर में ।
हाँ मैंने पढ़ा था कई बार
उसकी आँखों में छलकते दर्द कों
महसूस किया था
उसकी सिसकती सांसो कों
शायद वह सीख रही थी
खुद से लड़ना
पर हाय!
संवाद हीनता की पराकाष्टा
को क्या कहें ।
हिंदी कविता की तरह
हर बार
छली जाती रही वह ..........
एक पगली ऐसी भी ।
--------अनिल उपहार --------
Tuesday, June 28, 2016
मुक्तक
मेरे बालों को उँगलियों से कौन गूंथेगा ।
मेरे ज़ख्मों को दे के थपकी कौन चूमेगा ।
टकटकी बांध के दरवाजे पे दौड़ी आना
बेटा आया के नहीं अब ये कौन पूछेगा ।
अनिल उपहार
कविता
अरमानो की दहलीज़ पर
जलाते रहे हर बार
प्रतीक्षा के दीये
फ़िज़ा में घुली
स्वार्थ की गर्द
कर देती थी एक चुभन पैदा
किरकिरी सी
मन की आँखें
हो उठती थी लाल
एक अनचाहे दर्द से ।
शब्दकोश था विवश
नही कोई उपमा और
उपमान ।
अनुप्रास भी तो था अधूरा
कोई कैसे लिखता
टूट कर बिखर जाने की वज़ह ।
अनिल उपहार
Saturday, June 25, 2016
मुक्तक
बस नज़र में प्यार का आधार होना चाहिए ।
चाहतों का हर चमन गुलज़ार होना चाहिए ।
सर्द रातों में लगे जब चाँद भी जलने कहीं
प्यार में सौदा नही बस प्यार होना चाहिए ।
अनिल उपहार
Tuesday, June 21, 2016
अशआर
शोहरत तो हुई हासिल मगर ये याद भी रखना ।
ये वो हिमाला है जो टिकने नही देता ।
नेकियाँ की है तो उन्हें महफूज़ भी रखना
दिखावे का चलन कभी फलने नही देता ।
माँ बाप की खिदमत का जो कर लिया सौदा
बस सोच का ये दायरा उठने नही देता ।
अनिल उपहार
Sunday, June 19, 2016
फादर्स दे पर
अभावों के शीला लेख पर लिखी इबारत है पिता ।
दुर्दिनों के दौर में भी थपकी भरी हिदायत है पिता ।
तमाम उम्र तरसते रहै खुद छत के वास्ते ।
बच्चों के हौसलों की जियारत है पिता ।
,,,,,,,अनिल उपहार
Thursday, June 16, 2016
इंतज़ार
अरमानो की दहलीज़ पर
जलाते रहे हर बार
प्रतीक्षा के दिये
फ़िज़ा में घुली स्वार्थ की गर्द
कर देती थी एक चुभन पैदा
किरकिरी सी
मन की आँखें हो उठती थी लाल
एक अनचाहे दर्द से ।
शब्दकोश था विवश
नही कोई उपमा और उपमान ।
अनुप्रास भी तो था अधूरा
कोई कैसे लिखता
टूट कर बिखर जाने की वज़ह ।
अनिल उपहार
Thursday, June 9, 2016
छंद
घर के जो गमले में नागफणी उगाई तो
तुम्हे रात रानी भला रास नही आएगी ।
हुकूमत करते जो रहे अंधियारों की तो
उजालो की किरणे भी आँखें फेर जाऐगी ।
मतवाले रूप पर करना गुरुर मत
प्रीत की पवन से सुहास नही आएगी ।
चाहत के बादलों से करोगे किनारा गर
अधरों पे उगी प्यास फिर लौट जायेगी ।
अनिल उपहार
Tuesday, June 7, 2016
मुक्तक
आस अधरों पर लिए वो तिश्नगी तक आगये ।
दर्द के सहरा में भटके और नदी तक आगये ।
उससे ग़ाफ़िल हम रहे जीते रहे अपनी तरह
पीर जब बढ़ने लगी तो बन्दगी तक आगये ।
अनिल उपहार
Saturday, June 4, 2016
मुक्तक ।।।।
कभी उदासियों में आँख नम नही करना ।
ज़माना कुछ भी कहे कोई गम नही करना
साथ हमने जो गुज़ारे है उन पलों की कसम
रहें कहीं भी मगर प्यार कम नही करना ।
अनिल उपहार