--------औरत -----
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रोज़ की भागम भाग
सीने में दबाए दहकती आग
वक़्त की मार,
तानों की बोछार,
दोहरी जिन्दगी को
ढो रही सदियों से
अपनों से छली गई,
तंदुर में तली गई,
समर्पण की त्रासदी को
कब तलक पीती रहेगी ?
हाँ -
यह औरत है ।
सब कुछ सहती रहेगी ।
बीवी किसी की
बेटी किसी की
बहन किसी की
माँ किसी की
सब कुछ लुटाकर अपनों के बीच
खुद को मिटाकर
देहरी के दीप सी
जलती रहेगी ।
हां
यह औरत है
सब कुछ सहती रहेगी ।
------अनिल उपहार --------
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रोज़ की भागम भाग
सीने में दबाए दहकती आग
वक़्त की मार,
तानों की बोछार,
दोहरी जिन्दगी को
ढो रही सदियों से
अपनों से छली गई,
तंदुर में तली गई,
समर्पण की त्रासदी को
कब तलक पीती रहेगी ?
हाँ -
यह औरत है ।
सब कुछ सहती रहेगी ।
बीवी किसी की
बेटी किसी की
बहन किसी की
माँ किसी की
सब कुछ लुटाकर अपनों के बीच
खुद को मिटाकर
देहरी के दीप सी
जलती रहेगी ।
हां
यह औरत है
सब कुछ सहती रहेगी ।
------अनिल उपहार --------