शब्दों का प्रवाह
जब गुज़रता है
भावनाओं के सेतु से,
समझ के नवद्वार
स्मृति के रास्ते
देने लगते है
आमंत्रण विचारों कों ।
कि आओ ,
और लिख दो
कोई खंड काव्य
वेदना की गोद मे
बहते हुए अश्रुओं पर ।
तब
नन्हा सा सांझ का दीप
बुहारने लगता है
मन के कुहासे कों
किसी अनागत की
प्रतीक्षा में ।
अनिल जैन उपहार