Sunday, January 17, 2021

मन देहरी(मुक्तक)

अंतस की इस ऊहा पोह में कैसे दस्तक द्वार लगाऊँ ।

रूठ गयी अब मन की देहरी कैसे वंदनवार सजाऊँ ।

स्मृति  के अलसाये पन्ने और व्याकरण भी गहरा है

शब्दकोष भी विवश बहुत है अब कैसे प्रतिमान जुटाउँ ।

-------डॉ-अनिल उपहार -----

Thursday, January 14, 2021

अभागन कविता

अभागन
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सारी उपमाएं और
उपमान 
थोते थे 
उसके सामने ,
संघर्ष सदैव 
गलबहियां कर
उकसाते और
लेते थे इम्तहान उसका ,
मगर हर परीक्षा में 
अव्वल आने की ज़िद सी थी
उसके स्वभाव में ,
प्रतिकूलता की खाई
रोक नही पाती थी 
उसके अटल इरादों को ।
शायद सीख लिया था
उसने ,बदचलनी हवाओं से
संभलकर चलना,
इल्ज़ामों की
 लंबी फेहरिस्तके बीच ।

अनिल जैन उपहार

Thursday, January 7, 2021

मुक्तक असर (ज़िंदा है )

उसके लहजे में अदब और असर भी जिंदा है ।
उसके अहसास में शामिल वो सफर ज़िंदा है ।
जिसकी हर बात में मिश्री सी घुली लगती है 
उसके अल्फ़ाज़ में उल्फत का शहर ज़िंदा है ।

डॉ अनिल जैन उपहार