Saturday, January 28, 2017

विश्वास (कविता)

हर्फ़ हर्फ़ तेरा बिखरना
प्यास बन  अधरों पर ढलना
अश्रु की स्याही से
समृति के पृष्ठ पर
लिख देना
अलसायी आँखों की दासता ।
ये हुनर कहाँ से सीखा तुमने
सांसों के स्पंदन से बिखरे
सुरीले स्वर
गवाही नही है उस
अप्रतिम अहसास की
जिसके तुम
बेजोड़ कारीगर होने का
दम्भ  भरते थे ।
सच तो यही है
और
किसी शिल्पकार की
नायाब तराशी गयी
मूरत में
नक्काशी से
निखर कर सजीव हो उठने के
सारे गुण धर्म समाहित है
तुम्हारी आभा में ।

अनिल उपहार

Tuesday, January 10, 2017

नोटबंदी (मुक्तक)

कह  रहा अब नोट बंदी पर यहाँ आवाम है ।

मजलूमों की भीड़ में अलसायी सुबहो शाम है ।

होगये मुंह  से निवाले दूर अब तो रूठकर

मुफलिसी के दौर में सच ज़िन्दगी इलज़ाम है ।

अनिल उपहार

Monday, January 9, 2017

मुक्तक

चाहे ज़ख्म सहे होंगें हर चोट नेह की भाषा है ।

तारे गिन गिन रात गुज़ारें जीवन की अभिलाषा है ।

दोराहे पर शब्द मौन है भोर खड़ी है द्वारे पर

रात यही कहती है दिन से घोर निराशा में आशा है ।

अनिल उपहार

दैनिक मेट्रो नोएडा में आज प्रकाशित हुई रचना

Sunday, January 8, 2017

कविता(लिखूंगा कोई नवगीत)

मैं लिखूंगा कोई नव गीत
फिर से
स्मृति के कैनवास पर ।
गुज़रे पलों को
बनाऊंगा साक्षी ,
और
यादों के सुनहरे वरक़ पर
खिल उठेंगे सतरंगी स्वप्न ,
अलसायी भोर के आगोश में ।
नया दिनमान उतरेगा
लेकर कविता का मुहूर्त ।
और तुम देना उसे अपने स्वर
तब देखना
अधरों पर होगा
मिलन का मंगलाचार
जब तुम गुन गुनाओगे
साकार होजायेगा
रिश्तों का व्याकरण ।

अनिल उपहार

Saturday, January 7, 2017

कविता बेटी (आस्था आलंबन और विश्वास)

आस्था, आलम्बन ,विश्वास,
सदियों  से  यही  तो  चाहा  था,
तुमसे  इस  समाज  ने |
कभी  तुम  ययाति  की  बेटी 
माधवी  बन ,उत्सर्ग  करती  रही |
कभी  त्रेता  की  रेणुका  बन,
नही  पूछ  पाई  कोई  प्रश्न 
अपने  पति  या  पुत्रों  से |
कभी  तुम  अहिल्या  बन,
युग  युगों  तक  इन्द्र  के  पाप  का 
दण्ड  भोगती  रही-
जबकि  जानते  थे  सब,
की  तुम  छली  गई  हो,
द्रोपदी  के  चीर  हरण  से  लेकर 
सामूहिक  बलात्कार  कांड  तक |
हर  बार  तुम्हीं होती  रही,
सामाजिक  एवं  मानसिक  रुग्णता  की 
         शिकार |
तुम्हारी  इस  दशा  के  लिए 
आखिर  कौन  है  जिम्मेदार ?
समाज  की  सामंत  वादी  सोच 
          या 
सुन्न  पड़ी  संवेदना |
कभी  तुम  कबीर  की  वाणी  का 
आधार  बनी,
तो  कभी  जायसी  के  स्वच्छंद  प्रेम 
की  अभिव्यक्ति-
फिर  भी  ,हर  बार  तिल  तिल  कर 
मरती  रही  हो  तुम, और 
यह  समाज  हर  बार  शब्दों  के  मरहम  से 
भुनाता  रहा  तुम्हें |
निर्भया  |तुम्हांरी  मौत  ने 
खड़े  किये  है  अनेक  सवाल |
वो  सारे  प्रश्न है  आज  भी 
अनुत्तरित |
जो  शाश्वत, सार्वभौमिक, और  सर्वकालिक 
उत्तर  अवश्य  ही  ना  बन  पाए |
इन्हीं  में गुम  है  तुम्हारी  रूह  के 
ताज़ा  ज़ख्म,
जो  बयां  कर  रहें  है- 
औरत  होने  की  अंत  हीन  पीड़ा  कों |
-----अनिल उपहार -------

anil uphar at 9:53 PM

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3 comments:

SUKHMAL JAINFebruary 1, 2014 at 10:17 PM

aapki kavita lajavab hai badhai

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SUKHMAL JAINFebruary 1, 2014 at 10:21 PM

aap ki rachnaye bejod hai aise hi maa sharde ke bhandar ko bhrte rhe

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anil upharFebruary 2, 2014 at 9:18 AM

आपकी होसला अफजाई के लिए दिलसे आभार

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सागर म,प्र, में सञ्चालन और काव्यपाठ

कविता (तेरा होना)

तेरा होना रच देता है
मेरे गीत का मुहूरत ।
शब्द बहने लगते है
अविरल धारा से
मन का व्याकरण
गूंथता है उन्हें
नये प्रतिमानों में
उपमाए उल्लसित हो
करती है प्रेम का अभिषेक ।
अल्प विराम सा तुम्हारा रूठना
विस्मय बोध सा तुम्हारा
खिल खिलाना ।
पूर्ण विराम सा तुम्हारे
आगमन को ठहराव देना
अश्कों के मोती को
पलकों पर सजाना ।
क्या ठीक इसी तरह तो
नही है न
तुम्हारा मेरी दहलीज़ पर
पैर रखना ।
शायद कविता के बंध
नही बांध पाए तुम्हे शिल्प में
तभी तो -
अधरों पर अब नहीं गूंजते वो स्वर
जो कभी
हमारे वजूद को करते थे
रेखांकित ।

--------अनिल उपहार ---------

कविता(कविता लेती है जन्म)

कविता लेती है जन्म
गाँव के मुहानो पर
कविता पाती है आकार
झोपड़ियों के उड़ते गुबार में ।
कविता होती है साकार
सड़क पर जन्म देती माँ से
कविता निखरती है
असहाय और लाचार माँ के सीने में
कविता संवरती है
भूख से व्याकुल
बिलखते बचपन की सहजता से ।
कविता बिलखती है
अपनों से शर्म सार होते
रिश्तों
और मर्यादा की अर्थी को
ढोते हुए ।
कविता खोजाती है  अपना वजूद -
किसी की अस्मत को
तार तार होता देख
जब मौन होजाते है स्वर
नि:शब्द होजाता है मन
घायल हो जाती है लेखनी
लाचार होजाती है कलम ।
तब मर जाती है
कवि की आत्मा और
बच जाते है कुछ स्वप्न
फिरसे नई कविता को जन्म देने ।

अनिल उपहार ---------

कविता(औरत)

अंतर्राष्ट्रीय महिला  दिवस पर ।

------------------------

औरत
-------
रोज़ की भागम भाग

सीने में दबाए दहकती आग

वक़्त की मार,

तानों की बोछार,

दोहरी जिन्दगी को

ढो रही सदियों से

अपनों से छली गई,

तंदुर में तली गई,

समर्पण की त्रासदी को

कब तलक पीती रहेगी ?

हाँ -

यह औरत है ।

सब कुछ सहती रहेगी ।

बीवी किसी की

बेटी किसी की

बहन किसी की

माँ किसी की

सब कुछ लुटाकर अपनों के बीच

खुद को मिटाकर

देहरी के दीप सी

जलती रहेगी ।

हां

यह औरत है

सब कुछ सहती रहेगी ।

------अनिल उपहार --------

कविता(शायद तुम लौट आओ)

-----शायद तुम लौट आओ ------
----------------------------

मन का मरुस्थली सन्नाटा तोडती
तुम्हारी यादें
घोल देती थी
देह की हर दस्तक में मिठास ।

पलकों पर सजे सिंदूरी स्वप्न ।
बार बार देते निमंत्रण
मन देहरी पर
भावनाओं के
अक्षत चढाने कों ।

संस्कारों की सड़क के मुसाफिर सा
तुम्हारा बेखोफ चलना ।
तहजीब की ग्रंथावली के
कोमल किरदार को
सलीके से निभाना ।

पढ़ा देना बातों ही बातों में
मर्यादा का पाठ ।
विरदा वलियों का संवाद ।
जिसने रिश्तों के रंग मंच पर
अपना अभिनय
बखूबी करना सिखाया ।

अचानक-
वक़्त की आई तेज आंधी ने
सब कुछ
बिखेर कर रख दिया ।
और धूल धुसरित कर दिया
उन सभी रिश्तों कों ,
जिनकी छाँव में
हमने जीवन के सतरंगी सपनों को
बुना था ।

कहने कों अब नहीं हो
साथ मेरे ।
पर आज भी अहसास ज़िन्दा है
मन के किसी कोने में ।

तुम्हारा शांत नदी सा बहना ।
लहरों सा अठ खेलियाँ करना ।
और
अचानक छोड़ कर चल देना ।

मेरे गीत और छंद सूने है
तुम्हारे बगेर ।
फिर भी विश्वास है कि -
तुम लौट आओगे
और
अधरों पर गीत बन
बिखेर दोगे
अपने माधुर्य की ताज़गी ।
मै अपने गीत और छंद
तुम्हारे नाम करता हूँ ।
श्रध्दा की पावन प्रतिमा
मै तुम्हें प्रणाम करता हूँ ।

--------अनिल उपहार -------

मंगलायतन अलीगढ में पवन जी के साथ

कविता (मैं लड़की हूँ )स्मृति उपहार

आज मेरी बेटी स्मृति उपहार ने लिखी पहली कविता ।वो आप से अपना  आशीष चाहती है ।।।।।।

-----------------------------
हर वक़्त क्यों दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है ?
मै आत्म निर्भर हूँ ये काफी नहीं ।
हर वक़्त क्यों खुद कों साबित करना पड़ता है ?
क्या मै एक लड़की हूँ काफी नहीं ।
हर वक़्त क्यों दबाया जाता है ?
मै खुलना चाहती हूँ काफी नहीं ।
हर वक़्त क्यों पर काटे जाते है ?
मै उड़ना चाहती हूँ काफी नहीं ।
हर वक़्त क्यों जीने की वजह पूछी जाती है ?
मै जीना चाहती हूँ यह काफी नहीं ।
हर वक़्त क्यों दूसरों की पहचान दी जाती है ?
मै खुद की पहचान बनाना चाहती हूँ यह काफी नही ।
अनुत्तरित है बहुत से प्रश्न जो चाहते है तुमसे समाधान
आप दोगे न जवाब ???????

----------स्मृति उपहार -------

कविता (माँ)

-------माँ------------

तुमने संस्कारों के बीज रोप

संघर्षों के झंझावात और

असहनीय पीड़ा को भोगते हुए

लगाया था जो बिरवा ,

आज पल्लवित और पुष्पित होते देख

मन ही मन प्रसन्न होती थी तुम ।

        हे माँ !

तुम्हारी रिक्तता अब नही भर पायेगी

मन के सूने पन कों ।

उदासी और संस्कारों के स्पंदन को ।

लेकिन तुम्हारी दुआओ के दीप जगमगाएंगे ,

रोशन करेंगे सूनी राहों को ,

प्रकाशित करेंगे ,उदास हवाओं को ।

काश ! मै समझ पाता माँ होने की परिभाषा

और लिख पाता एक महाकाव्य तुम पर

मेरे गीत और छंद पुकारते है तुमको

लेकिन मै जानता हूँ कि तुम कभी नहीं लौटोगी उस यात्रा से

हे ! ममतामयी ,देवी स्वरूपा,

वात्सल्य मूर्ति माँ !तुम्हें अनंत प्रणाम ।।

--------अनिल उपहार -----

कविता(वक्तकी बैसाखी)

वक़्त की बैसाखी पर
दूसरों का सहारा बन
गुमनाम रास्तों पर
भटकते भटकते
अचानक आई आंधी
और तेरे होसलों की
उडान ने दिया था
संबल
तेरी यादो की बारिश
और गेसुओ की महक
दे गयी प्रतीक्षा की
कभी न खत्म होने वाली
श्रंखला ।
मै आज भी उसी दौराहे पर
अपलक निहार रहा हूँ
तेरी बाट ।
और तुम ये सब देखते ।
काश !तुम यहाँ होते ।

-------अनिल उपहार -------

कविता (तेरा होना)

तेरा होना रच देता है
मेरे गीत का मुहूरत ।
शब्द बहने लगते है
अविरल धारा से
मन का व्याकरण
गूंथता है उन्हें
नये प्रतिमानों में
उपमाए उल्लसित हो
करती है प्रेम का अभिषेक ।
अल्प विराम सा तुम्हारा रूठना
विस्मय बोध सा तुम्हारा
खिल खिलाना ।
पूर्ण विराम सा तुम्हारे
आगमन को ठहराव देना
अश्कों के मोती को
पलकों पर सजाना ।
क्या ठीक इसी तरह तो
नही है न
तुम्हारा मेरी दहलीज़ पर
पैर रखना ।
शायद कविता के बंध
नही बांध पाए तुम्हे शिल्प में
तभी तो -
अधरों पर अब नहीं गूंजते वो स्वर
जो कभी
हमारे वजूद को करते थे
रेखांकित ।

--------अनिल उपहार ---------

कवयित्री सम्मेलन हरदा

कविता(रिश्तों की पगडण्डी)

रिश्तों की पगडण्डी पर
चलते चलते
भौतिकता की फिसलन में
संभल नही पाते कदम
और आधुनिकता की
बैसाखियों में ढूंढते सहारा
क्या मंजिल तक
पहुंचा सकेंगे
कल्पना के पंख ।
परिंदों ने कहाँ सीखा
ये हुनर
आसमां ने तो नही की
कभी फिरका परस्ती ।
फिर हमने कहाँ से
सीख लिया
शून्य होती संवेदना का
गणित ।
शायद पढ़ लिया है हमने
संवाद हीनता का व्याकरण
तभी भूल गए हम अहसासो
की शब्दावली ।
-----------अनिल उपहार -------

कविता(पाती )

कविता(भावनाओ का सेतु)

भावनाओं के सेतु से तुम्हारा
बैखोफ गुज़र जाना ।
और कदम दर कदम
छोड़ जाना ऐसे निशां
जिन पर लिखे को
कोई बांच नही सकता ।
नफरत की अंधी खाई को
कोई पाट नही सकता ।

शायद ये फितरत नही तुम्हारी
सिर्फ फ़िज़ा में छाया वो धुंवा है
जो देखने नही देता
तुम्हारी आँखों कों
रिश्तों की सच्चाई ।

तभी तो उतर आते है
इन आँखों में संशय के ज्वार ।
और लगा देते है
अपनी परम्परागत मुहर
पराये को पराया समझते रहने की ।

---;;;;अनिल उपहार

कविता(महिला दिवस पर)

महिला दिवस पर
-------------

यूँ कहने कों तो हर बार कराते रहे
मेरी महानता का बोध ।
पढ़ाते रहे भरोसे का पाठ
पर खुद नहीं कर पाए भरोसा मुझ पर
हर बार मेरे अस्तित्व पर लगाते रहे
प्रश्न चिन्ह ।
करते रहे मेरे वज़ूद को तार तार ।
जबकि जानते थे तुम कि
छली गयी हूँ मैं
शब्दों के मरहम से भुनाई जाती रही हूँ मैं ।
तुम ही गढ़ते रहे उपमान
सजाते रहे प्रतिमान
अपनी शब्दावलियों से ।
मैं थामे रही रिश्तों का व्याकरण
निभाती रही अपना धर्म
इस उम्मीद से कि तुम बनोगे मेरे विशवास
की बैसाखी
दोगे वही ओहदा सम्मान
जिसे गाते रहे हो तुम
अपने गीतों और कविताओं में
दे पाओगे ???????????

------अनिल उपहार ----/

कविता(संस्कारों की सड़क )

संस्कारों की सड़क के मुसाफिर की तरह
भावनाओ के सेतु से
तुम्हारा बेख़ौफ़ गुजरना
निश्छलता के धूमकेतु सा
संबंधों के आकाश में
स्थापित हो
अपनी अद्वितीय आभा से
रिश्तों के धवल पृष्ठ पर
लिख देना एक ऐसी इबारत
जिसे वक़्त की आंधी
मिटा नहीं सकती
स्वार्थ का जल धो नहीं सकता ।

कहाँ से लाऊँ
उपमान प्रतिमान
संवेदना की स्याही
जिसे बांच सकूँ
और लिख सकूँ
कोई खंड काव्य तुम पर
बस लिखता रहूँ तुम पर
बस तुम्ही पर।।।।।।।

अनिल उपहार।।।।।।

कविता( फ़िज़ा में घुली)

अरमानो की दहलीज़ पर
जलाते रहे हर बार
प्रतीक्षा के दीये

फ़िज़ा में घुली
स्वार्थ की गर्द
कर देती थी एक चुभन पैदा
किरकिरी सी
मन की आँखें
हो उठती थी लाल
एक अनचाहे दर्द से ।

शब्दकोश था  विवश
नही कोई उपमा और
उपमान ।
अनुप्रास भी तो था अधूरा
कोई कैसे लिखता
टूट कर बिखर जाने की वज़ह ।

अनिल उपहार

Friday, January 6, 2017

कविता(राह निहारते नयना)

राह निहारते व्याकुल नयना
बाट जोहती मन देहरी
अधरों पर छाई ख़ामोशी
क्या तुमको नही दिखती ।
ओ प्रियतम
उदास पड़े सावन के झूले
काहे को विरहन को भूले ।
सिसक रही हाथों की महंदी
बेबस तुम बिन तीज भी
और मैं
तक रही हूँ हर और से आती आहट को
कि लौट आओगे तुम
और भर लोगे अपने आगोश में ।
बस प्रतीक्षा में तुम्हारी
लिख रही हूँ
मन के कोरे पृष्ठों पर
विरह के गीत
कि आओगे तुम
और दोगे उन्हें अपने स्वर ।

अनिल उपहार

कविता(मलयानिल की हवा)

मलयानिल की मन्द समीर
जब छूकर गुज़रती थी
उस के अहसास को
तो रोम रोम एक अज़ीब सी
महक से महक उठता था ।

अपनी गुरुता का नही था
उसे कोई गुरुर
निश्छल और उदार मन
उसकी  वैचारिक दक्षता पर
सहज हस्ताक्षर से
प्रतीत होते थे ।

अहम और बनावटी
मसालेदार
वाक्य विन्यास
उसके शब्दकोश में
थे ही नहीं ।

यथार्थ के जिवंत दस्तावेज
पर
वक़्त के कैनवास को
रंग भर
सजीवता प्रदान करना
बखूबी आता था उसे ।

और अचानक एक दिन
अविश्वास की अमिट स्याई ने
उसके अंतर्मन को झकझोर
कर रख दिया ।

बेबाक़ बयानी शांत होगयी
निःशब्द होगया वो
और ढह गया
संबंधो का विशाल सेतु
जो जोड़ता था
मन और विश्वास के रिश्तों को ।

शायद किसी कल्पना के पंखों से
भर पाये वो उड़ान
और नवगीत सा उतर आए
समृति के धुंधले पृष्ठों पर ।

अनिल उपहार ।।।।

कविता (रक्षाबंधन)

हर बार तुमने
मेरी सूनी कलाई पर
अपने स्नेह के हस्ताक्षर कर
अपनी दुआओ के तमाम दस्तावेज
मेरे नाम कर दिए ।
और मैंने भी रवायतो के खाली
प्रष्ठ पर अपनी जेब के कुछ पल
तुम्हारी हथेली पर रख
अपने फ़र्ज़ की इति श्री कर ली ।
क्या सही अर्थों में
निभा पाया हूँ मै तुम्हारे स्नेह के
मुल्य कों ?
आज के इस पवित्र दिन
मेरे हाथों में बंधे इस धागे की कसम
मेरा वचन है तुम्को
की अब कोई बहन अपने भाई से
नही मांगेगी रक्षा का वचन ।
हर भाई ठीक मेरी ही तरह
निभाएगा हर वो फ़र्ज़
जिस पर सिर्फ बस सिर्फ बहन
तुम्हारा ही हक होगा ।
और दूर चौराहों पर तुम कर सकोगी
बेखोफ विचरण
हजारो की भीड़ में और हर वक़्त
खड़ा पाओगी किसी भाई को अपने
साथ ।

-----------अनिल उपहार --------

कोटा कवि सम्मेलन

श्वेता सरगम का काव्यपाठ मेरा सञ्चालन

मारवाड़ी समाज कोटा का लाजवाब सञ्चालन

भीलवाड़ा राजस्थान सञ्चालन

कोटा का लाजवाब सञ्चालन

मेरा सञ्चालन और यादगार आयोजन चौमहला

कविता (करवाचौथ)

इस बार भी आगया करवा चौथ
और देखो न
हर बार की तरह तुम्हारी सलामती का व्रत और
सोलह श्रृंगार बस आपके लिए ।
मेरे ह्रदय पटल पर अंकित है
सारे अनसुलझे प्रश्न
समाधान तो बस तुम ही थे न
आओ आज उस चन्द्रमा की चांदनी में निखार दो
अपनी
चांदनी को
और लिख दो
अपनी उपस्थिति से
मेरे सात जन्मों के साथ के दस्तावेज पर
अपनी वसीयत ।
विश्वास और समर्पण
की यह सम्पदा
सिर्फ बस सिर्फ
मेरी धरोहर थी
सदा रहेगी ।
कभी न खिंचेगी
अविश्वास और अहम की
कोई रेखा
संबंधो के इस सेतु पर ।
बस तुम्हारी ही प्रतीक्षा में ।।।।

अनिल उपहार

हरसिद्धि महाकाल के दरबार में

मुक्तक(मात भारती )

मात भारती सिसक रही है सरहद की लाचारी पर ।

और विवश है ज़र्रा ज़र्रा दोगली तैयारी पर ।

खून बहाया बेटो ने बलिदान व्यर्थ नही जायेगा ।

सिर्फ राख छाई है थोड़ी धधकती चिंगारी पर ।

अनिल उपहार

मुक्तक

सफर हम तय भी कर लेते जो होता साथ तू मेरे ।

मिटा देते हम हर एक फासला जो होता साथ तू मेरे ।

ज़माने की रवायत को भी पीछे छोड़ आते हम

कदम तो खुद ही चल पड़ते जो होता साथ तू मेरे ।

अनिल उपहार

गीतिका (कहने को व्याकुल है मन भी)

कहने को व्याकुल है मन भी

घोर उदासी सहता तन भी ।

चले विषमताओं की आंधी

रूठी डोर जो प्रीत की बांधी ।

ऐसे में तेरा जाना भी रास नही बिलकुल आता है ।

आजाओ निर्मोही साजन गीत विरह के मन गाता है ।

अनिल उपहार

अपलक निहारती (कविता)

अपलक निहारती
क्षितिज के उस पार
बीते हुए साल की
सहेजी हुई यादों कों
खामोशियों की पगडंडी ।

शीत में उष्णता का
अहसास कराती
तेरे चुपचाप चले जाने की वज़ह ।

और मैं
नन्हें से किरदार की तरह
रिश्तों के रंगमंच पर
कर रहा होता हूँ
मिलन के अदभुत पलों का
जिवंत अभिनय ।

अनिल जैन उपहार

मुक्तक

गुज़रे लम्हों के साये में बैठे मन में आंच लिए ।

ख़त तुमने लिक्खे थे जो भी अक्षर अक्षर बांच लिए ।

धुंधली होगई सारी लिखाई और स्याही भी थी फीकी

नज़रों ने सारे ही उत्तर एक पल में ही जांच लिए ।

अनिल जैन उपहार

मुक्तक(अनछुए सब पहलुओं का )

अनछुए सब पहलुओं का वो बड़ा फनकार क्यूँ है ।

है बहुत कमसिन मगर खामोश सा किरदार क्यूँ है ।

इन वफाओं का चलन भी खो गया तन्हाइयों में

सब देखकर के यूं लगा ये ज़िन्दगी दुश्वार क्यूँ है ।

अनिल जैन उपहार

Muktak (तू ज़माने की नज़र में )

तू ज़माने की नज़र में इक बड़ा फनकार है ।

बेच दे अपनी अना को जा खुला बाजार है ।

मैं पला हूँ ज़िन्दगी भर धूप की आगोश में

मखमली कालीन पर चलना मेरा  दुश्वार है ।

अनिल जैन उपहार