Monday, May 29, 2017

मुक्तक (शहीद की चाह)

सदा फांकों में रहके चाहतो के दिन उजाले थे ।

जुगाली करते सांसों की भले रूठे निवाले थे ।

लगा माथे से मिट्टी देश की सरहद को चूमा था

तिरंगा ही कफ़न हो आखरी अरमान पाले थे ।

अनिल उपहार

Friday, May 19, 2017

वृद्धाश्रम (मुक्तक)

समाये घर में चारो धाम तीरथ आओ कर आएँ ।

कि जिन कदमो में जन्नत है चलो उनको मना लाएँ ।

वे  पूजा पाठ सजदे    ये नमाज़े पूरी होगी तब

कि अब भूले से वृद्धाआश्रम माँ बाप ना जाएँ  ।

अनिल उपहार

मुक्तक (वर्द्धाश्रम)

समाये घर में चारो धाम तीरथ आओ कर आएँ ।

जिन कदमो में जन्नत है चलो उनको मना लाए ।

ये पूजा पाठ सजदे और नमाज़े पूरी होगी तब

कि अब भूले से वृद्धाआश्रम माँ बाप ना जाए ।

अनिल उपहार

Tuesday, May 16, 2017

कविता(हुनर)

माना कि
कामयाबी के गुरु शिखर थे तुम
हर सफलता पाकर तुम्हे
अभिभूत हो गौरव पा जाती थी ।
राह के पत्थर
तुम्हारे कदमों का स्पर्श पा
अपने आप
तराश जाते थे खुद को ।

सारे सम्मान पर्याय ही तो थे
तुम्हारे अभिनन्दन के
शब्द सरिता बन
बहने लगते थे
छंद गीतों की भाषा
बोलने लगते थे ।
हर अंदाज़ ग़ज़ल में ढल
अदब का इतिहास
रच जाता था ।
कलम निःशब्द और मौन है ।
नये प्रतिमान गढ़ने को ।

अनिल उपहार

Monday, May 15, 2017

कविता(ख़ामोशी)

लक्ष्मण रेखा की तरह
होती थी तुम्हारी हर बात
उसकी परिधि को लांघना
मेरी सामर्थ्य में
कभी रहा ही नही ।
फिर कैसे
अविश्वास की परत
हर बार हमारे संवाद में
बाधक बन खड़ी रही ।
ख़ामोशी का सफर भी
कितना अज़ीब होता है न
अहम के तिलिस्म को
टूटने नही देता ।
और
मन है कि मानने को तैयार नही
किसी भी कीमत पर ।
प्रतीक्षा में आज भी ।।।।।।

अनिल उपहार

Saturday, May 13, 2017

मातृ दिवस (मुक्तक)

मेरे बालों कों उंगलियो से कौन गूंथेगा ।

मेरे ज़ख्मों को देके थपकी कौन चूमेगा ।

टकटकी बाँध के दरवाज़े पे दौड़ी आना

बेटा आया कि नहीं अब ये कौन पूछेगा ।

अनिल जैन उपहार

Thursday, May 11, 2017

कविता (समाधान)

मन जब जब
पवित्रता का आचमन
करने लगा
तुम्हारे सवालों ने
उसे कटघरे में
ला खड़ा कर दिया ।
बड़ी अज़ीब दासतां  है
ये रिश्तों की ।
फ़िज़ा में घुलता ज़हर
अब रिश्तों को भी
निगलने लगा है ।
क्या कोई निश्छल नही हो सकता ????
बस यही प्रश्न घेरे है मुझे
अनुत्तरित प्रश्न समाधान चाहते है
तुमसे
दोगे न तुम????

अनिल जैन उपहार

मुक्तक

दुआओ से बडा कोई खजाना नही ।

अश्कों को पलकों पर सजाना नहीं ।

रिश्ते भी देखो पूर्ण विराम से हुए

अब भरोसे के लायक जमाना नहीं ।

------------अनिल उपहार -----

Sunday, May 7, 2017

कविता(सन्नाटा)

दूर तक फैला सन्नाटा
ख़ामोशी की चादर ताने
अलसाये जज़्बात
कैसे जाने मायने दोस्ती के
शायद  विवश रहा होगा
शब्दकोश तुम्हारा ।
हम पढ़ नही पाये
तुम समझ नही पाये ।
तभी तो
प्रश्नों की एक लम्बी श्रृंखला
खीच गयी थी दीवार ,
हमारे दरमियाँ ।
खामोश तुम
खामोश हम ।
निःशब्दता खड़ी है
पैर पसारे ।

अनिल जैन उपहार

Saturday, May 6, 2017

पराकाष्ठा(कविता)

खो देने का भय
पाने की उत्कण्ठा
मर्यादा की देहरी तक ,
सम्बन्धो के सेतु से
गुजरते अहसासों पर ,
बनते बिगड़ते रिश्तों का
अर्थ खोजने लगती है -
आत्मविश्वास
दृढ़ होने लगता है ।
मन बुनने लगता है
शब्दों के ताने -बाने
शब्द शहद की तरह
घुल जाते है रोम रोम में
शायद यही तो नहीं
प्रेम की पराकाष्ठा ।।।।।

अनिल उपहार

चिठ्ठी (यादें)

देह की हर दस्तक में
घोल रही है मिठास
जीवन जल उलीचती
तुम्हारी यादें ।
उस प्रथम चिठ्ठी की तरह
जिसका हर्फ़ हर्फ़
महक रहा है आज भी
तुम्हारी खुशबू से ।

अनिल जैन उपहार

Friday, May 5, 2017

मुक्तक(चिठ्ठी)

हमने तो अहसास लिखा था चिठ्ठी में ।

जीवन को मधुमास लिखा था चिठ्ठी में ।

वो धुंधले अक्षर तुम ही बांच नही पाये

खोया हुआ विश्वास लिखा था चिठ्ठी में ।

अनिल उपहार

Wednesday, May 3, 2017

गीतिका(वर्तमान हालात पर)

कैसे कह दे छप्पन इंची सीने का हम दम भरके ।

हर बार रहे खाते मुँह की चौखट पर उनके सर धरके ।

चीख रहा आवाम देश का आजाद करो अब सेना कों ।

दे  जवाब उनकी भाषा में बतलादो ये सेना कों ।

कब तक सर काटे जायेंगे पूछ रही भारत माता ।

सोन चिरैया भी शर्मिंदा सुन कर अपनी गौरव गाथा ।

अनिल जैन उपहार

Tuesday, May 2, 2017

मुक्तक(राजे उल्फत)

राजे उल्फत को अपने दिल में छुपाये रखिये ।

ये सफर है इसे कदमों से मिलाये रखिये ।

वक़्त की धूप में जलना तो अपना लाज़िम था

अपने आँचल को ज़माने से बचाये रखिये ।

अनिल जैन उपहार

Monday, May 1, 2017

कविता (आहट)

उसकी हर चोट
शिल्पी बन तराशती रही ।

खुद बुत बना
ख़ामोशी ओढ़
निःशब्द हो गया ।
तहज़ीब के दुशाले
अब भी है रोशन
उसकी हर आहट
पर अंकित है
साथ गुज़रे हुए पलों के
सवालिया निशां ।

अनिल उपहार