Wednesday, December 28, 2022

मुक्तक

सूरज थक कर सो गया ,पंछी लौटे गाँव 

दंश लगी देने हमें ,स्मृतियों की छाँव ।

शारदीय मधु चन्द्रिका ,सनी प्रेम रस रात

सहज छुअन से खिल उठा ,गौरी का मृदु गात।

---------अनिल उपहार ------

Tuesday, December 27, 2022

कविता स्मृति उपहार

मेरी बिटिया की दूसरी कविता आपके स्नेह और आशीष की कामना के साथ ।

उम्मीद 
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उम्मीद, पूरी  हो जाये तो ज़िन्दगी के मायने बदल देती है 
और अधूरी रह जाये तो जिंदगी बदल देती है ।
उम्मीद, विश्वास है कि मन्ज़िल जरूर मिलेगी
विश्वास पूरा हो तो क्या कहने ?
उम्मीद गर पूरी हो तो ख़ुशी का मन्ज़र ही कुछ और होगा 
गर न मिले तो अनुभवो के गुलदस्तों की 
प्यारी महक छोड़ जाती है ।
कहते है कि उम्मीद पर ही दुनियां कायम है 
जब उम्मीद टूटती है तो 
विश्वास के कांच को टुकड़ो में बदल देती है ।
टूटे हुए टुकड़े हमे याद दिलाते है 
उस अहसास की 
जिसकी हमने कभी उम्मीद की थी ।
उम्मीद ,हिस्सा है अहसासों का 
जो ज़िन्दगी के किस्से बुनता है ।
और यही किस्सा 
जीवन के सतरंगी सपनो का तैयार करता है 
भव्य महल ।
इसी महल में सिमटे होते है हजारो स्वप्न 
जो तय करते है 
जीवन की दशा और दिशा ।
और यही उम्मीद आज भी है कायम
कि सपने सच होंगे सारे 
जो कभी हमने देखे थे किसी उम्मीद से ।

समृति उपहार

Sunday, December 25, 2022

मुक्तक(खता)

प्यार का सिलसिला यूंही चलता रहा।
ख्वाब आंखों में दिन रात पलता रहा।
इक ज़रासी खता क्या हुई इस कदर
वो भी जलता रहा,मैं भी जलता रहा।

डा अनिल जैन उपहार

Saturday, December 24, 2022

मुक्तक (गम का बादल)

#saturday -post 42

तेरी चाहत का हंसी लम्हा याद आता है।
मन के अहसासो से वो और निखर जाता है।
तुझ से मिलना भी जरूरी है  पर ये कैसे कहूं,
गम का बादल मेरी आंखों में उतर जाता है ।।।।।

डा अनिल जैन उपहार

Tuesday, December 20, 2022

शिखर जी बचाओ

हमने तुमको अपना माना मान दिया सम्मान दिया।
जैन जगत के साथ क्यूं तुमने सौतेला व्यवहार किया।
निर्वाण भूमि यह तीर्थंकर की मन चाहा पा जाते है।
भक्ति भाव से वंदना कर के भव सागर तीर जाते है।
सबसे ज्यादा टैक्स हम देते दान भी हम ही देते है।
चींटी तक को कष्ट न पहुंचे ऐसा जीवन जीते है।
धर्म संस्कृति की रक्षा हित हमने प्राणों का लोप किया
राष्ट्र ने दी आवाज हमे तो हमने अभिनंदन सौंप दिया।
सम्मेद शिखर पर मोज मस्ती का बाज़ार नहीं फलने देंगे।
सत्ता के मद में अंधों का व्यापार नहीं चलने देंगे।
विनम्र निवेदन शासन से कि आदेश ये अपना वापस लो।
सम्मेद शिखर गौरव जैनों का उनको उनका गौरव दो।

डा अनिल जैन उपहार

Monday, December 19, 2022

मुक्तक

मेरे जीवन के सभी रंग तुमसे निखरे है।
मेरी कविता के हरेक छंद पाक मिसरे है।
तेरी यादों के हिमाले से दमकते मोती
गंध बन कर  के आज फिर फिज़ा में बिखरे है।
    डा अनिल जैन उपहार

Friday, December 9, 2022

कविता ,(रिश्ता)

भावनाओं के सेतु से तुम्हारा 
बैखोफ गुज़र जाना ।
और कदम दर कदम
छोड़ जाना ऐसे निशां 
जिन पर लिखे को 
कोई बांच नही सकता ।
नफरत की अंधी खाई को 
कोई पाट नही सकता ।

शायद ये फितरत नही तुम्हारी 
सिर्फ फ़िज़ा में छाया वो धुंआहै 
जो देखने नही देता 
तुम्हारी आँखों कों 
रिश्तों की सच्चाई ।

तभी तो उतर आते है 
इन आँखों में संशय के ज्वार ।
और लगा देते है 
अपनी परम्परागत मुहर
पराये को पराया समझते रहने की ।

---;;डॉ अनिल जैन उपहार

Tuesday, December 6, 2022

मुक्तक

वो रस्में सारी उल्फत की पल में तोड़ आया मैं ।

मिला था जो विरासत में उसे भी छोड़ आया मैं ।

शहर की चौंध याति रोशनी ने कर दिया अंधा

बूढ़ी माँ के हाथों के निवाले छोड़ आया मैं ।

अनिल जैन उपहार

Thursday, December 1, 2022

 इक प्रणय गीत है एक प्रणय छंद है ।


तन से तन को मिली जो मधुर गंध है ।


देखा बासंती मन तो नयन कह उठे


प्यास का तृप्ति से आज अनुबंध है ।


अनिल जैन उपहार#@कॉपीराइट

Thursday, November 10, 2022

कविता

शब्दों के सागर कों 
मन जब जब खंगालने लगा 
हर बार 
तेरा ही अक्स उभर आया 
कभी कविता 
कभी गज़ल 
तो कभी 
छंदों  की पायल में 
तुझे ही खनकता पाया 
मेरे ये गीत मेरे नहीं 
तेरे कोमल स्पर्श का 
कोमल अहसास  है
तन भले ही हो पराया 
पर मन तुम्हारे पास है 
तभी तो 
मेरे अधरों पर आज भी 
स्वर तुम्हारे गूंजते है
दर्द तो बस गीत रचता है 
तू ही तो है जो मेरे हर गीत में 
बसता है 
बिन तुम्हारे  संकलन  
आज तक अधुरा है
न कविता पूरी होसकी 
न गीत पूरा हो सका है ...

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@अनिल उपहार

Tuesday, October 25, 2022

विदाई गीत

विदाई गीत।
संयम के पंछी तोड़ पिंजरा शिवपुर नगरी में
चल दिए सबको छोड़,मोह के बंधन तोड़।
                     (  १ )
मिला चातुर्मास हमको सौभाग्य पिड़ावा का।
संयम से अलंकृत था हर गान पिड़ावा का।
अब रोके से न रुके कदम ये बढ़ते जाते है,
मोक्ष महल की ओर,चल दिए सबको छोड़।
                     (  २ )
आंखों का अश्रु जल गंगा सा बहता है।
हम धीर दरें कैसे मन घुट घुट सहता है।
अब नही किसी से आज,शरण में रखना अपने पास
छूटे ना जीवन की डोर,चल दिए सबको छोड़।
                      (३)
गर भूल हुई हम से,तो माफ कर देना।
बादल ये उदासी के सब साफ कर देना।
आशीर्वाद का हाथ सदा माथे पे रखना आप
आप ही जीवन की भोर,चल दिए सबको छोड़।
                       (४)
है चरणों में अर्पित,भावांजलि मेरी।
हर छंद कविता का, आद्रांजली मेरी।
आशीष से बनते और संवरते सारे बिगड़े काज
छोटी सी ये अरदास,मस्तक पे रखना हाथ।
                        (५)
गुरुदेव आप जैसा,ना हुआ कोई होगा।
बरसों की साधना का,ही पुण्य फला होगा।
कब आओगे गुरुवर,बतादो पिड़ावा नगर की ओर
भीगी है पलकों की कोर,चल दिए सबको छोड़।
                       ,,,,,,,,,,,,,,,,,,

Sunday, September 25, 2022

मुक्तक बेटी दिवस पर

तितली है बाग की नई उड़ान बेटियां।
रिश्तों के नर्म लहज़े का उनवान बेटियां।
बस श्लोक की तरह  इन्हें गुनगुनाइए 
मंदिर की आरती भी है अज़ान बेटियां।

डॉ अनिल जैन उपहार

Wednesday, August 31, 2022

मुक्तक

जिंदगी जंग है तो जंग लड़ेंगे हम भी।

रिक्त जीवन में  कई रंग भरेंगे हम भी

किसी बंधन में बंधे हों  ये जरूरी तो नहीं 

राह कैसी भी हो पर संग चलेंगे हम भी ।

डॉ अनिल जैन उपहार

डॉ अनिल जैन उपहार

Monday, August 29, 2022

मुक्तक ।।।। श्रृंगार

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कहूँ कैसे की कोई कर गया पावन मेरे मन कों ।

छुआ महंदी भरे हाथों से चन्दन कर दिया तन कों ।

नहीं अब जी कहीं लगता वो लम्हा याद आता है ,

किसी के प्रेम की बारिश भिगो कर जब गयी मन कों ।

----- डॉ अनिल जैन उपहार

Sunday, August 28, 2022

रक्षा कवच कविता

हर बार तुमने 
मेरी सूनी कलाई पर 
अपने स्नेह के हस्ताक्षर कर 
अपनी दुआओ के तमाम दस्तावेज
मेरे नाम कर दिए ।
और मैंने भी रवायतो के खाली 
प्रष्ठ पर अपनी जेब के कुछ पल 
तुम्हारी हथेली पर रख 
अपने फ़र्ज़ की इति श्री कर ली ।
क्या सही अर्थों में 
निभा पाया हूँ मै तुम्हारे स्नेह के 
मुल्य कों ?
आज के इस पवित्र दिन 
मेरे हाथों में बंधे इस धागे की कसम 
मेरा वचन है तुम्को 
की अब कोई बहन अपने भाई से 
नही मांगेगी रक्षा का वचन ।
हर भाई ठीक मेरी ही तरह 
निभाएगा हर वो फ़र्ज़ 
जिस पर सिर्फ बस सिर्फ बहन 
तुम्हारा ही हक होगा ।
और दूर चौराहों पर तुम कर सकोगी 
बेखोफ विचरण 
हजारो की भीड़ में और हर वक़्त 
खड़ा पाओगी किसी भाई को अपने 
साथ ।

-----------अनिल उपहार --------

Friday, August 26, 2022

मुक्तक।।।बुजुर्गो की दुआओं का

समंदर गम का गहरा था किनारा मिल गया मुझको।
राह दुर्गम थी अंधियारी सितारा मिल गया मुझको।
ये मेरी खुश नसीबी थी मैं तन्हा हो नही पाया,
बुजुर्गों की दुआओं का सहारा मिल गया मुझको ।
----------अनिल उपहार ------

Sunday, July 24, 2022

ओ बदरा (उम्मीद)

बड़े दयालु हो बदरा तुम
तुम नही देख सकते
इंतज़ार में पथराई आंखें
भले ही सब तुम्हें कोसने में 
लगे रहे,
तुमने उम्मीदों के शिलालेख पर
कर ही दिये हस्ताक्षर फुहारों के।
भिगो दिये
तपते अलसाये मिट्टी के 
जड़वत पड़े
खेत खलिहानों को।
लौटा दी फिर से चादर
हरीतिमा की।
बस ऐसे ही महरबानी बनाए रखना
और बरस जाना टूटी उम्मीदों को ज़िंदा रखने के लिए।

डॉ अनिल जैन उपहार

Thursday, July 14, 2022

ओ शिल्पी(कविता)

ओ शिल्पी 
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कोई नन्हा सा किरदार था 
वो रिश्तों के रंगमंच का ।
जीवन के सुख दुःख 
देखे थे बहुत करीब से उसने ।
एक शिल्पी सा तराशना चाहता था वो 
अनछुए पहलुओं कों ।
बनाना चाहता था 
पत्थर को भी भगवान ।
उसकी बातों में था 
अज़ीब सा सम्मोहन 
सादगी और लावण्य का 
पर्याय थी उसकी विनम्रता ।
अचानक आई वक़्त की 
तेज आंधी ने 
नफरत की ऐसी दिवार खड़ी करदी 
जिसने सारे तिलिस्म कों 
झकझोर कर रख दिया ।
किसी और दुनियां से आया 
वो किरदार 
गुमनाम बस्ती में कहीं खो गया 
शायद फिर से लौट आए वो शिल्पी 
और तराश जाये पत्थर को 
भगवान की तरह ............,

अनिल उपहार

Thursday, June 2, 2022

मुक्तक(महाराणा प्रताप)

देख हौसले चेतक के मुगलों के छक्के छूट गए।
राणा के मजबूत इरादों से पाखंडी सपने टूट गए।
जिनके दम से हल्दी घाटी गौरव से महिमा मंडित है।
एकलिंग दीवान कठे यह शौर्य भूमि अभिवंदित है।

डॉ अनिल जैन उपहार

Monday, April 18, 2022

संचालन करते हुए कनवास मेला रामनवमी

कनवास कवि सम्मेलन 17अप्रेल22

कोरोना

महामारी तो उग्र हुई है सब्र हमें करना होगा।
घर मे रह कर चंद दिनों तक खुद में ही रहना  होगा।
स्वास्थ्य यदि बचा लेंगे तो जीवन खुशहाल बनेगा ही,
तम हारेगा तय है इतना अंधकार भागेगा ही।
इम्तहान की घड़ी आज सबको खरा उतरना है
विश्वास टूटने मत देना बस प्रलय के पंख कुतरना है।
हम फिरसे सशक्त बनेंगे तब चेन तोड़ यह पाएंगे।
कोरोना क्या चीज़ बड़ी हिम्मत से इसे हराएंगे।

डॉ अनिल जैन उपहार

Friday, March 25, 2022

मुक्तक धड़कनों की पालकी से

धडकनोँ की पालकी से हर बार मन तुमकोँ निहारे ।

गीत,कविता,छन्द,ही क्या खुद गजल तुमको सँवारे ।

नेह निमंत्रण तुमको है नव गीत अधरों पर धरो,

जीवन के रेखा चित्रोँ मेँ आकर बासंती रंग भरो ।

,,,mere geet ka mukhda ,डॉ अनिलuphar,copy राइट

Monday, March 21, 2022

तुम लौट आओ।।(कविता)

-----शायद तुम लौट आओ ------
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मन का मरुस्थली सन्नाटा तोडती 
तुम्हारी यादें 
घोल देती थी 
देह की हर दस्तक में मिठास ।

पलकों पर सजे सिंदूरी स्वप्न ।
बार बार देते निमंत्रण 
मन देहरी पर 
भावनाओं के 
अक्षत चढाने कों ।

संस्कारों की सड़क के मुसाफिर सा
तुम्हारा बेखोफ चलना ।
तहजीब की ग्रंथावली के 
कोमल किरदार को 
सलीके से निभाना ।

पढ़ा देना बातों ही बातों में 
मर्यादा का पाठ ।
विरदा वलियों का संवाद ।
जिसने रिश्तों के रंग मंच पर 
अपना अभिनय 
बखूबी करना सिखाया ।

अचानक-
वक़्त की आई तेज आंधी ने 
सब कुछ 
बिखेर कर रख दिया ।
और धूल धुसरित कर दिया 
उन सभी रिश्तों कों ,
जिनकी छाँव में 
हमने जीवन के सतरंगी सपनों को 
बुना था ।

कहने कों अब नहीं हो 
साथ मेरे ।
पर आज भी अहसास ज़िन्दा है 
मन के किसी कोने में ।

तुम्हारा शांत नदी सा बहना ।
लहरों सा अठ खेलियाँ करना ।
और 
अचानक छोड़ कर चल देना ।

मेरे गीत और छंद सूने है 
तुम्हारे बगेर ।
फिर भी विश्वास है कि -
तुम लौट आओगे 
और 
अधरों पर गीत बन 
बिखेर दोगे 
अपने माधुर्य की ताज़गी ।
मै अपने गीत और छंद 
तुम्हारे नाम करता हूँ ।
श्रध्दा की पावन प्रतिमा 
मै तुम्हें प्रणाम करता हूँ ।

--------अनिल उपहार -------

Saturday, March 5, 2022

शादी समारोह में

बिटिया तैयार रिसेप्शन के लिए ।।।।।।

दीप प्रज्ज्वलन के समय पिताजी ।।।।

पिताजी के साथ सुसराल पक्ष के परिवार जन

नेत्र शिविर में माताजी की पुण्यतिथि पर मरीजों के लिए भोजन बनाती हुई परिवार की सदस्य।।।।।

बहुत प्यारे भाई मध्य प्रदेश कॉंग्रेस के अहम हस्ताक्षर पारस जी जैन के साथ।।।।।

Wednesday, January 19, 2022

गीतिका /गोद मे मां की

कभी प्यार में फिसल के देखो ।

अंधियारों कों निगल के देखो ।

 खाकर ज़ख्म संभल के देखो ।

अपनी सोच बदल के देखो ।

खुशियों से भर जाओगे तुम 

 गोद में माँ की मचल के देखो।

-------डॉ-अनिल जैन उपहार ----

Sunday, January 9, 2022

मुक्तक आशा और निराशा

चाहे ज़ख्म सहे होंगे, हर चोट नेह की भाषा है ।

तारे गिन गिन रात गुज़ारें ,जीवन की अभिलाषा है ।

दोराहे पर शब्द मौन है ,भोर खड़ी है द्वारे पर 

रात यही कहती है दिन से ,घोर निराशा में आशा है ।

###डॉ अनिल जैन उपहार

Wednesday, January 5, 2022

मुक्तक पले जो खार दामन में

पलें जो खार दामन में ज़रा उनकों गला देना  ।

मिलें जो दंश अपनों से उन्हें दिल से भुला देना ।

उजाले फिर न भटकेंगे कभी ग़म के अंधेरों में 

बुझाये जो कभी दीपक उन्हें फिरसे जला देना ।

-----------डॉ अनिल जैन उपहार -------