Tuesday, December 2, 2025

मुक्तक

जुगनू बन के रहे चमकते सूरज को आंख दिखाते है ।
चुल्लू भर पानी नहीं जिनको सागर को चिढ़ाते है।
आंगन की तुलसी का तो सम्मान नहीं कर पाए वो,
इतिहास बदल देने का झूठा सपना रोज दिखाते है।

डॉ अनिल जैन उपहार