Thursday, June 28, 2018
Thursday, June 21, 2018
बोझिल मन (कविता)
श्वांस दर श्वास
कम होती जिंदगी
पल पल बढ़ती
स्वार्थ परक रिश्तों में
राजनीति,
हर वक़्त किसी अनहोनी
के भय से दम तोड़ती
दोहरी ज़िम्मेदारी ।
आधुनिकता को ओढ़े
कलयुगी प्राण,
आखिर हम क्या पढ़ रहे है
समझ से परे होती
संस्कारों की पाठशाला
बेबस और लाचार मन
असहजता को छान रहा है
जिम्मेदारियों के बोझ तले ।
अनिल जैन उपहार
Tuesday, June 19, 2018
जलन(कविता)
ये जो मौन का तिलिस्मी चादर
ओढ़े हुए हो न
तुम,
हर जवाब छुपा है
सारी कार गुज़ारियो का ।
तोड़ कर दूर जाने की
बारीकियां और कला
महारथ हासिल है तुम्हे
बढ़े हुनरमंद हो न तुम,
पर अलगाव की आग
बड़ी उष्ण होती है
जान लो तुम।।।।।
अनिल जैन उपहार
Wednesday, June 13, 2018
Sunday, June 10, 2018
मुक्तक (महक जाता हूँ)
यूँ तो खो देने के डर ही दहक जाता हूँ ।
हिचकियाँ जब भी जगाए तो बहक जाता हूँ ।
अज़ीब कारीगरी है हँसी निगाहों की ,
वो जो छू ले तो मैं संदल सा महक जाता हूँ ।
अनिल जैन उपहार
Wednesday, June 6, 2018
रिश्ते(कविता)
रिश्तों के बीच
गहराती
गलत फहमियां मिटाने
का
नही होता है
कोई मुहूर्त ,
बस इस
मोबाइल संस्कृति से
बाहर आइये,
थोडा सा वक़्त
उन अपनो के लिए भी
निकालिये जो -
हर सांस अपनी निचोड़ गए
हमारी सांसों के लिए।
सिर्फ कुछ पल
बतिया लीजिये बूढ़ी आंखों के
साथ
उनकी उम्र बढ़ जाएगी
और हमारी सांसे ।
अनिल जैन उपहार
Monday, June 4, 2018
शायद तुम लौट आओ(कविता)
-शायद तुम लौट आओ ------
----------------------------
मन का मरुस्थली सन्नाटा तोडती
तुम्हारी यादें
घोल देती थी
देह की हर दस्तक में मिठास ।
पलकों पर सजे सिंदूरी स्वप्न ।
बार बार देते निमंत्रण
मन देहरी पर
भावनाओं के
अक्षत चढाने कों ।
संस्कारों की सड़क के मुसाफिर सा
तुम्हारा बेखोफ चलना ।
तहजीब की ग्रंथावली के
कोमल किरदार को
सलीके से निभाना ।
पढ़ा देना बातों ही बातों में
मर्यादा का पाठ ।
विरदा वलियों का संवाद ।
जिसने रिश्तों के रंग मंच पर
अपना अभिनय
बखूबी करना सिखाया ।
अचानक-
वक़्त की आई तेज आंधी ने
सब कुछ
बिखेर कर रख दिया ।
और धूल धुसरित कर दिया
उन सभी रिश्तों कों ,
जिनकी छाँव में
हमने जीवन के सतरंगी सपनों को
बुना था ।
कहने कों अब नहीं हो
साथ मेरे ।
पर आज भी अहसास ज़िन्दा है
मन के किसी कोने में ।
तुम्हारा शांत नदी सा बहना ।
लहरों सा अठ खेलियाँ करना ।
और
अचानक छोड़ कर चल देना ।
मेरे गीत और छंद सूने है
तुम्हारे बगेर ।
फिर भी विश्वास है कि -
तुम लौट आओगे
और
अधरों पर गीत बन
बिखेर दोगे
अपने माधुर्य की ताज़गी ।
मै अपने गीत और छंद
तुम्हारे नाम करता हूँ ।
श्रध्दा की पावन प्रतिमा
मै तुम्हें प्रणाम करता हूँ ।
--------अनिल उपहार -------
कवि गीतकार
काव्यांजलि पोस्ट पिडावा जिला झालावाड
राजस्थान
मोब 09413666511
Sunday, June 3, 2018
कविता(शायद तुम लौट आओ)
-शायद तुम लौट आओ ------
----------------------------
मन का मरुस्थली सन्नाटा तोडती
तुम्हारी यादें
घोल देती थी
देह की हर दस्तक में मिठास ।
पलकों पर सजे सिंदूरी स्वप्न ।
बार बार देते निमंत्रण
मन देहरी पर
भावनाओं के
अक्षत चढाने कों ।
संस्कारों की सड़क के मुसाफिर सा
तुम्हारा बेखोफ चलना ।
तहजीब की ग्रंथावली के
कोमल किरदार को
सलीके से निभाना ।
पढ़ा देना बातों ही बातों में
मर्यादा का पाठ ।
विरदा वलियों का संवाद ।
जिसने रिश्तों के रंग मंच पर
अपना अभिनय
बखूबी करना सिखाया ।
अचानक-
वक़्त की आई तेज आंधी ने
सब कुछ
बिखेर कर रख दिया ।
और धूल धुसरित कर दिया
उन सभी रिश्तों कों ,
जिनकी छाँव में
हमने जीवन के सतरंगी सपनों को
बुना था ।
कहने कों अब नहीं हो
साथ मेरे ।
पर आज भी अहसास ज़िन्दा है
मन के किसी कोने में ।
तुम्हारा शांत नदी सा बहना ।
लहरों सा अठ खेलियाँ करना ।
और
अचानक छोड़ कर चल देना ।
मेरे गीत और छंद सूने है
तुम्हारे बगेर ।
फिर भी विश्वास है कि -
तुम लौट आओगे
और
अधरों पर गीत बन
बिखेर दोगे
अपने माधुर्य की ताज़गी ।
मै अपने गीत और छंद
तुम्हारे नाम करता हूँ ।
श्रध्दा की पावन प्रतिमा
मै तुम्हें प्रणाम करता हूँ ।
--------अनिल उपहार -------
कवि गीतकार
काव्यांजलि पोस्ट पिडावा जिला झालावाड
राजस्थान
मोब 09413666511