प्रतीक्षा की नर्म नाज़ुक
हथेलियों ने
रचा ली है आज मेहंदी ।
मन की कच्ची दीवारे
भयभीत है
अवसरवादी हवाओं की
छुअन से,
कोई मौन संवाद
दे रहा है दिलासा
बुनियाद रखी है मेहनत से
किसी ने अपनी आरजुओं को
कर के दफन,
हो सके तो सहेज लेना तुम भी
ठीक उसी तरह,
जिस तरह सहेज कर
खो गया कोई
अपना वजूद
दे कर छत तुम्हे । ।
अनिल जैन उपहार