मेरे गीतों को स्वर अपने देदो प्रिए
मन की वीणा कभी फिर बजे न बजे।
प्रीत का फिर घरौंदा सजाओ शुभे वंदन वारे कभी फिर सजे न सजे।
मैने पूजा तुम्हे देवता मानकर अर्घ्य गीतों के अबतक चढ़ाता रहा।
मन के दीपक में सांसों की बाती लिए नेह की ज्योत अबतक जलाता रहा।
भावना के जो रख लो अधर पर कलश,
मन के मंदिर में दीपक जले ना जले।
मैं अंधेरों से लड़ता रहा उम्र भर
और उजाले मुझे ढूंढ ते ही फिरे।
वो मेरे स्वप्न में कल भी आया था पर स्मृति के पटल पर थे बादल घिरे।
ये अंधेरों की चादर समेटो प्रिए
मन के मंदिर में दीपक जले ना जले।
प्रीत की झील में फिर खिले है कमल
मन का उपहार है जो लिखी ये गजल।
गेसुओं का ये पर्दा हटाओ प्रिए
मद भर ये नयन फिर मिले ना मिले।
ज्योत जब भी जली नेह के दीप की
आंधियां ग़म की उसको बुझाती रही।
मैं पुजारी हुआ रस्म ऐसी रही मेरी पूजा तुम्हे नित बुलाती रही।
वंदना में अब हाथों को जुड़ जाने दो
अर्चना के ये दीपक जले ना जले।