Wednesday, February 22, 2017

मुक्तक (पाती बसंत के नाम )

भ्रमर करने लगे गुंजन फ़िज़ा भी मुस्कुराती है ।

अली ने संग कलियों के लिखी बासंती पाती है ।

कुसुमित द्वार पर सज कर किलोले कर रहे पल्लव

चली पुरवाई फागुन की मिलन के  गीत गाती है ।

अनिल जैन उपहार

मेरी बिटिया की कविता दैनिक मेट्रो के आज के अंक में प्रकाशित ।।।।

Monday, February 20, 2017

दैनिक मेट्रो नोएडा में आज फिर मिला मेरी रचना को सम्मान

कविता (औरत)

---औरत -----
-------------------

रोज़ की भागम भाग

सीने में दबाए दहकती आग

वक़्त की मार,

तानों की बोछार,

दोहरी जिन्दगी को

ढो रही सदियों से

अपनों से छली गई,

तंदुर में तली गई,

समर्पण की त्रासदी को

कब तलक पीती रहेगी ?

हाँ -

यह औरत है ।

सब कुछ सहती रहेगी ।

बीवी किसी की

बेटी किसी की

बहन किसी की

माँ किसी की

सब कुछ लुटाकर अपनों के बीच

खुद को मिटाकर

देहरी के दीप सी

जलती रहेगी ।

हां

यह औरत है

सब कुछ सहती रहेगी ।

------अनिल उपहार --------

Sunday, February 19, 2017

कविता(शायद तुम लौट आओ)

--शायद तुम लौट आओ ------
----------------------------

मन का मरुस्थली सन्नाटा तोडती 
तुम्हारी यादें 
घोल देती थी 
देह की हर दस्तक में मिठास ।

पलकों पर सजे सिंदूरी स्वप्न ।
बार बार देते निमंत्रण 
मन देहरी पर 
भावनाओं के 
अक्षत चढाने कों ।

संस्कारों की सड़क के मुसाफिर सा
तुम्हारा बेखोफ चलना ।
तहजीब की ग्रंथावली के 
कोमल किरदार को 
सलीके से निभाना ।

पढ़ा देना बातों ही बातों में 
मर्यादा का पाठ ।
विरदा वलियों का संवाद ।
जिसने रिश्तों के रंग मंच पर 
अपना अभिनय 
बखूबी करना सिखाया ।

अचानक-
वक़्त की आई तेज आंधी ने 
सब कुछ 
बिखेर कर रख दिया ।
और धूल धुसरित कर दिया 
उन सभी रिश्तों कों ,
जिनकी छाँव में 
हमने जीवन के सतरंगी सपनों को 
बुना था ।

कहने कों अब नहीं हो 
साथ मेरे ।
पर आज भी अहसास ज़िन्दा है 
मन के किसी कोने में ।

तुम्हारा शांत नदी सा बहना ।
लहरों सा अठ खेलियाँ करना ।
और 
अचानक छोड़ कर चल देना ।

मेरे गीत और छंद सूने है 
तुम्हारे बगेर ।
फिर भी विश्वास है कि -
तुम लौट आओगे 
और 
अधरों पर गीत बन 
बिखेर दोगे 
अपने माधुर्य की ताज़गी ।
मै अपने गीत और छंद 
तुम्हारे नाम करता हूँ ।
श्रध्दा की पावन प्रतिमा 
मै तुम्हें प्रणाम करता हूँ ।

--------अनिल उपहार -------

Thursday, February 16, 2017

मुक्तक (दुहाई दे के रस्मों की )

दुहाई दे के रस्मों की वो दामन छोड़ जाता है ।

भिगो कर रोज़ ही पलकें वो सावन छोड़ जाता है ।

बड़ी शिद्दत से उसके आगमन की चिर प्रतीक्षा थी

दिलासा दे के उम्मीदों का दर्पण तोड़ जाता है ।

अनिल जैन उपहार

मुक्तक (दुहाई दे के रस्मों की )

दुहाई दे के रस्मों की वो दामन छोड़ जाता है ।

भिगो कर रोज़ ही पलकें वो सावन छोड़ जाता है ।

बड़ी शिद्दत से उसके आगमन की चिर प्रतीक्षा थी

दिलासा दे के उम्मीदों का दर्पण तोड़ जाता है ।

अनिल जैन उपहार

Thursday, February 2, 2017

पद्मिनी(कविता)

जौहर की ज्वाला को जिसने माना अपना गहना था ।
सती हो गयी छत्राणि नही गुलामी सहना था ।

जिसकी गौरव गाथाए युग सदियो से गाता है ।

कोमलांगी थी वो बाला सच इतिहास बताता है ।

फिर कैसे उसके वैभव पर तुम प्रश्न चिन्ह लगा बैठे ।

भूल गए मर्यादा सारी माँ का दूध लजा बैठे ।

भौतिकता की चकाचौंध में नैतिकता को भूल गए

अपनी अस्मिता को भूले नग्नता पर फूल गए ।

दौलत के बाजार के तुम अदने से व्यापारी हो ।

जम्बूरे के इशारों पर नाचने वाले मदारी हो ।

पद्मिनी का इतिहास ज़रा भी दिल से तूने  पढ़ा होता ।

ख़िलजी के तलवो की कालिख अपने सर न मढ़ा होता ।

तुम क्या जानो मर्यादा वो सबक नही पढ़ पाये तुम ।

इतिहासों के शिलालेख के अक्षर बांच न पाये तुम ।

थौति शोहरत के चक्कर में अपने उसूल तक भूल गए ।

पद्मा का यश गाना था ख़िलजी की बाँहों में झूल गए ।

अमर इतिहास है रानी का सिरफिरों के बस की बात  नही ।

धूल चुमले क़दमों की उस ख़िलजी की औकात नही ।

अनिल उपहार

कविता (नियति)

नियति ।।
।।।।।।।।
कभी रवायतों की बेड़ियों में
जकड़ी
तो कभी झुलसती रही
मर्यादा की चौखट पर ,
जबकि जानते थे सब
बिना संवादों की धूप के
सर्द होजाते है रिश्ते ।
अहसास को रहन रख
हर बार बुनती रही
मौन की तिलिस्मी चादर ।
बस संस्कारों की दुहाई दे
चुप कराई जाती रही ,
ओढ़ाकर शालीनता का दुशाला ।
और द्विअर्थी टिप्पणियों को झेल
बुहारती रही ,
अपने ऊपर लगी निरर्थक
इल्ज़ामों की धूल ।
ज़माने की पीर को
चुपचाप सह जाना ।
अपनों से हर बार
छले जाना ।
नियति बन चुकी थी ।
यह सोंच कि -
मुझे करने है रोशन
दो जहाँ
तभी तो हर बार ,
देहरी के दीप सी जलती रही
घुटन का सैलाब अंतस में लिये
अश्कों कों पीती रही ।
मुझे गढ़नी है
संस्कारों की पाठशाला
और सिखाना है ,
मेरी खुद की जाई कों
फिर से यही सब कुछ
सहने का सबक ।

अनिल उपहार