Sunday, March 31, 2024

मुक्तक (कैक्टस उगने लगे)

हास और परिहास लिए लिख बैठी पाती आंगन में।

वो अमुआ की महकी डाली राग छेड़ती आंगन में।

बूढ़ा बरगद गुमसुम क्यों है पूछ रही फिर गौरैया,

नीम गया कैक्टस उग आया भौतिक वादी आंगन में।

डा अनिल जैन उपहार