Thursday, May 30, 2024

तप्त धरा ,(गीत)

तप्त धरा, उम्मीदें हारी निर्जला उपवास करे धरती।
ऐसे में आजाओ मेघा मन की बदली आहें भरती।

कुछ झूठे आडंबर ने धरती का सीना चीर दिया।
जंगल बने रिसोर्ट यहां,भौतिकता ने अधीर किया।
मनचाहे सपनों की खातिर हमने जंगल काट दिया।
जहां गुलमोहर सजता था वहां कंकरीट से पाट दिया।

सुनो विधाता विनती यह सब कर्म हमारे  जाए है।
जिसने जैसा बोया है उसने वैसे ही फल पाए है।

डा अनिल जैन उपहार@

Thursday, May 16, 2024

मुक्तक (रस्मे उल्फत)

रस्में उल्फत की अपने दिल में रवानी रखना।

फिर से मिलने ओ मिलाने की कहानी रखना।

लाख हो जुल्म के पहरे वफा की राहों में,

अपनी आंखों में मुहोब्बत की निशानी रखना।

डा अनिल जैन उपहार

Wednesday, May 15, 2024

मुक्तक (रिश्तों का मंडप)

रिश्तों के मंडप के नीचे भाव समर्पण होता है।

संस्कारों का शामियाना महिमा मंडित होता है ।

कभी वहम की चिंगारी जब अहम पे भारी हो जाए,

तब नैतिक मूल्यों का दर्पण अपना वैभव खोता है ।

डा अनिल जैन उपहार

Monday, May 13, 2024

मुक्तक(खामोशी की ओढ़ के चादर)

खामोशी की ओढ़ के चादर बिन बोले रह जाते है ।
कुछ सपने पलकों पर आकर अलसाये रह जाते है ।
माना शोहरत और ये दौलत रहन तुम्हारे आंगन में,
कुछ किस्से ऐसे  होते है बिना कहे कह जाते है ।

डा अनिल जैन उपहार

Saturday, May 11, 2024

लेखा कर्मो का(

स्मृति  के गलियारों में ,कर्मो का लेखा जांच रहा हूं।

मैं अतीत के धुंधले पन्ने ,तोल मोल कर बांच रहा हूं।

जीवन की अंतिम सांसों की, गठरी कुछ खामोश पड़ी है।

कितना छल कितना धोखा पल पल देखा किश्त बड़ी है।

डा अनिल जैन उपहार

Wednesday, May 1, 2024

भाग्य के घर देर ही है (मुक्तक)

प्रारब्ध माना आंसुओं से यह समय का फेर ही है।
यति नियम सब गति समाहित भाग्य के घर देर ही है।
अनसुना सब मौन ही था अधर पढ़ते कैसे कथानक,
किरदार अपना अपना ही था कैसे कह दूं बेर ही है।

डा अनिल जैन उपहार