Thursday, July 26, 2018

इस बारिश(कविता)

इस बारिश कुछ इस तरह
भीगा जाये
कुछ उलाहनों की नदियां हो
शिकायतों की तलैया हो
और हम अपनो के साये में
बेखोफ कूद जाये
रिश्तो के सागर में ।
जहाँ नेह के अदभुत
झरने थाम ले

बेइंतहा प्रतीक्षा की
घड़ियों को ।
देहरी खोल दे बन्द द्वार
दमक उठे कल्पना के
सतरंगी इंद्रधनुष
आओ मिलकर भरदे
इनमें कुछ रंग ।।।

अनिल जैन उपहार

Thursday, July 19, 2018

अलसायी सुबह(कविता)

स्मृति के खंडबिम्ब
और कौंधते शब्द
नित देते
मेरी सर्जना को
संदर्भ ।
ठीक उसी तरह
सावन की पहली बून्द ने
लिख दिया था
मिलन के पृष्ठ पर
अलसायी सुबह का सच ।
गवाह है वो हस्ताक्षर
जो आज भी दर्ज़ है
सुनहरी यादों के दस्तावेज पर ।

अनिल उपहार

Wednesday, July 11, 2018

कविता(कहर)

बारिश में नहाया
पूरा शहर
घोर उदासी का
आवरण ओढ़े,
बाट जोहती
अलसायी देहरी ,
खिलता हुआ अमलतास
जैसे चिढ़ाने को हो आतुर
हर बार उलाहनों के
विस्तार पाते दायरे,
शिकायतों की
मोटी होती फ़ेहरिस्त
और उस पर
मौसम का कहर,
बांध लिये है घुँघरू
संवेदनाओ ने
अनागत की प्रतीक्षा में ।

अनिल जैन उपहार

Wednesday, July 4, 2018

कलमकार(कविता)

उदासी की किश्तों में
बन्द
ज़ार ज़ार होती दलीलें
किसी बेकसूर आदमी
के हलफनामे की
धुंधली सियाही की तरह
बांच नही पाता मन,
खामोशी के केनवास पर
भर देना चाहता है
न जाने कितने चटख रंग,
कौन है जो बदल देता है
कूँची हर बार,
कलमकार के व्याकुल हृदय की
मौन भाषा
क्या गहरे संवाद तो नही
करना चाहती ?
कैसे लिखदें कोई
गवाही
और सुनादे फिर अनहोना सा
फैसला ।

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