शब्दों के सागर को मन जब जब खंगाल ने लगा
हर बार तेरा ही अक्स उभर आया ।
कभी कविता, कभी गजल ,तो कभी
छंदों की पायल में ,
तुम्हें ही खनकता पाया ।
मेरे ये गीत मेरे नहीं
तेरे विश्वास का कोमल अहसास है ।
तन भले ही हो पराया पर मन तुम्हारे पास है।
तभी तो मेरे अधरों पर आज भी
स्वर तुम्हारे गूंजते है ।
दर्द तो बस गीत रचता है
तू ही तो है जो हर गीत में बसता है ।
बिन तुम्हारे संकलन आज तक अधुरा है
न कविता ही पूरी हो सकी, न गीत ही हुआ पूरा है ।
Anil uphar @copy-राइट---------------------