Thursday, December 19, 2024

मुक्तक छंदों को पायल

चलो छंदों की पायल में तुझे फिर से सजा लू  मै।

मेरी ग़ज़लों में तू ढल जा तुझे मतला बना लू मै।

तड़पता गीत है तुम बिन,सिसकती हर रूबाई है,

हजारों ग़म भुलाकर के तुझे अपना बना लू मै।

डा अनिल जैन उपहार

Wednesday, September 25, 2024

कविता का सम्मान

यादगार कवि सम्मेलन होटल सुराणा पेलेस उज्जैन

उज्जैन कवि सम्मेलन

मुक्तक(कालिमा नयन की)

जब नयन की कालिमा पर गीत कोई ढल उठे।

गेसुओ की स्निग्धता पर छंद मंडित हो उठे।

उस मिलन को आखरी अनुबंध में अपने पिरोना।

तृप्ति से कुछ पल चुरा कर अश्रु जल से फिर भिगोना।

डा अनिल जैन उपहार
@highlight

Wednesday, September 18, 2024

मुक्तक(बसर कर दो)

जहाँ बरसों था विराना वहाँ आकर बसर करदो ।

मेरे गीतों को स्वर देकर प्रेम  के रस से तर करदो ।

मिलेंगे सैकड़ो किस्से यहाँ पर हीर रांझा के ,

ह्रदय के पट ज़रा खोलो मुहोब्बत कों अमर करदो ।

डा अनिल उपहार -------
09413666511

Thursday, September 12, 2024

हिंदी दिवस पर

उपमाओं ने गूंथा इसको बिंबों ने खूब संवारा।

कभी अलंकृत हुई धरा पर गीतों ने खूब निखारा।

पंथ निराला की बेटी बन तुलसी का मान बढ़ाया।

दिनकर के आंगन की शोभा भावों ने थाल सजाया।

माथे की बिंदी सी शोभित ये हिंदी कहलाती है।

मां की लोरी की मधुर तान सुन बचपन को दुलराती है ।

डा अनिल उपहार

Wednesday, September 4, 2024

छंद गीतों ने उतारे(मुक्तक)

मन देहरी पर बस निशा हो आगमन के ही तुम्हारे।

भोर की उजली किरण फिर बांचती हो खत हमारे।

द्वार पर जलता दिया रख आस ने कुछ यूं कहां,

तृप्ति ने अनुबंध लिख कुछ छंद गीतों के उतारे।

डा अनिल जैन उपहार

Monday, September 2, 2024

प्रीत का दामन(मुक्तक)

दसों दिशाएं अभिभूत हो दुलराती है नेह का आंगन।

जाने किसने लिखी भूमिका आंखों में आ उतरा सावन।

पूर्वाग्रह की तेज हवाएं आंखों में नश्तर सी चुभती,

कौन भंवर में उलझ गए तुम छोड़ गए वो प्रीत का दामन।

डा अनिल जैन उपहार

मन का पपिहा(मुक्तक)

अश्रु कण ने बोए होगे जब कुछ नवल गीत वसुधा पर।

अपरिभाषित उपमाओं ने गूंथी होगी वंदनवारें।

प्रार्थनाएं मौन खड़ी बन याचक जैसे पंथ बुहारे,

आगत के स्वागत में व्याकुल मन का पपिहा बाट निहारे।

डा अनिल जैन उपहार

Tuesday, August 13, 2024

मुक्तक(किरदार)

तू ही किरदार रहा है मेरे फसाने का ।

तू ही अंदाज़े बयां है मेरे तराने का ।

मेरे अधरों पे जो मचले वो गीत भी तू है

तुझसे सीखा है हुनर मैंने गुनगुनाने का ।

  डा अनिल जैन उपहार

anil uphar

Monday, August 12, 2024

गुरु मां पूर्णमति माताजी के साथ चर्चा करते हुए।ग्वालियर में दीक्षा महोत्सव समारोह में।

खूबसूरत पल ग्वालियर की धरती पर

वंशिका जराल के साथ मंच साझा करते हुए ग्वालियर मध्य प्रदेश में

बहुत खूबसूरत यादगार कार्यक्रम

ख्यातनाम गायिका वंशिका जराल के साथ

मुक्तक(किरदार)

तू ही किरदार रहा है मेरे फसाने का ।

तू ही अंदाज़े बयां है मेरे तराने का ।

मेरे अधरों पे जो मचले वो गीत भी तू है

तुझसे सीखा है हुनर मैंने गुनगुनाने का ।

अनिल जैन उपहार

anil uphar

Saturday, July 20, 2024

गीतिका तुम बिन

तुम बिन,,,,,,,,
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बहुत बेदर्द आँखें है बड़े बेजार मंजर है ।           

मेरी पलकों के पीछे पलरहे लाखों समंदर है ।   
                                                                         
         ज़रा ठहरो मेरी सुनलो कि 

 तुम बिन जी नही सकते ।

            अश्कों के समंदर को 
                                                                  

        तन्हा पी नहीं सकते

तो आजाओ मुझे आजाद करदो अपनी चाहत से 

सिहर उठता है मन दरवाजे की हल्की सी आहट से 

बहुत से कारवां आते हे लेकिन तुम नही आते 

तुम्हारे बिन ये सावन के हमे झूले नही भाते ।

अभी भी वक्त है आओ लिखो अधरों पे सावन तुम 

करदो तन मेरा चन्दन ज़रा होले से छूकर तुम ।

----------------अनिल उपहार ------

यादगार कार्यक्रम

सारगर्भित आत्मीय उदबोधन माननीय मुख्यमंत्री महोदया का।

अदभुत कार्यक्रम शानदार आत्मीयता मैडम की।

मंच संचालन की तारीफ करती आदरणीया मुख्यमंत्री महोदया

वसुंधरा राजे जी के साथ

पूर्व मुख्यमंत्री महोदया के साथ ।मंच संचालक की भूमिका में।सेटेलाइट अस्पताल झालरापाटन का सम्मान समारोह।।।।

पिताजी के साथ एक यादगार पल

Friday, June 28, 2024

अधूरा है गीत बिन तुम्हारे(गीतिका)

शब्दों के सागर को मन जब जब खंगाल ने लगा 
हर बार तेरा ही अक्स उभर आया ।
कभी  कविता, कभी गजल ,तो कभी 
छंदों की पायल में ,
तुम्हें ही खनकता पाया ।

मेरे ये गीत मेरे नहीं 
तेरे विश्वास का कोमल अहसास है ।

तन भले ही हो पराया पर मन तुम्हारे पास है।

तभी तो मेरे अधरों पर आज भी 
स्वर तुम्हारे गूंजते है ।
दर्द तो बस गीत रचता है 
तू ही तो है जो हर गीत में बसता है ।

बिन तुम्हारे संकलन आज तक अधुरा है 
न कविता ही पूरी हो सकी, न गीत ही हुआ पूरा है ।

Anil uphar @copy-राइट---------------------

Sunday, June 16, 2024

लहज़ा

यूं तो रिश्तों को निभाने का हुनर आता है ।
हरेक लहजे में बस तू ही तू नजर आता है।
जिसे छू कर के मेरी रूह महक जाया करती ,
तेरी बातों में वो लहज़ा वो असर आता है ।
डा अनिल जैन उपहार

मुक्तक लहज़ायूं तो रिश्तों को निभाने का हुनर आता है ।हरेक लहजे में बस तू ही तू नजर आता है।जिसे छू कर के मेरी रूह महक जाया करती ,तेरी बातों में वो लहज़ा वो असर आता है ।डा अनिल जैन उपहार

बातों में मिश्री सी डली कानों में रस घोल गया ।

आंखों ही आंखों में सब कुछ बोल गया।

पलकों पर सतरंगी सपने आकर ऐसे ठहर गए,

खट्टे मीठे अनुभव सारे एक ही पल में तोल  गया ।

 डा अनिल जैन उपहार ------ ।

मुक्तक

बातों में मिश्री सी डली कानों में रस घोल गया ।

आंखों ही आंखों में सब कुछ बोल गया।

पलकों पर सतरंगी सपने आकर ऐसे ठहर गए,

खट्टे मीठे अनुभव सारे एक ही पल में तोल  गया ।

 डा अनिल जैन उपहार ------ ।

Wednesday, June 5, 2024

चुनाव के बाद

कैसे गज़ब चुनाव हुए हर कोई खुशियां मना रहा है।

कोई अपनों से दूर हुआ कोई अपनों को बना रहा है ।

लोकतंत्र का मूल यही बस ,यहां तंत्र प्रभावी होता है ।

कोई सेहरा बांध रहा है तो कोई सेहरा सजा रहा है ।

डा अनिल जैन उपहार

चुनाव परिणाम के बाद

बचपन के सब शोक थे अपने अजब गजब इन पहियों से।

जीवन की पगडंडी नापी सच में इन दो पहियों से।

खूब गिरे उठकर संभले फिर गिरने को तैयार रहे,

घर की जिम्मेदारी भी क्या खूब निभाई इन पहियों से।

डा अनिल जैन उपहार

Monday, June 3, 2024

विश्व सायकल दिवस पर

बचपन के सब शोक थे अपने अजब गजब इन पहियों से।

जीवन की पगडंडी नापी सच में इन दो पहियों से।

खूब गिरे उठकर संभले फिर गिरने को तैयार रहे,

घर की जिम्मेदारी भी क्या खूब निभाई इन पहियों से।

डा अनिल जैन उपहार

Thursday, May 30, 2024

तप्त धरा ,(गीत)

तप्त धरा, उम्मीदें हारी निर्जला उपवास करे धरती।
ऐसे में आजाओ मेघा मन की बदली आहें भरती।

कुछ झूठे आडंबर ने धरती का सीना चीर दिया।
जंगल बने रिसोर्ट यहां,भौतिकता ने अधीर किया।
मनचाहे सपनों की खातिर हमने जंगल काट दिया।
जहां गुलमोहर सजता था वहां कंकरीट से पाट दिया।

सुनो विधाता विनती यह सब कर्म हमारे  जाए है।
जिसने जैसा बोया है उसने वैसे ही फल पाए है।

डा अनिल जैन उपहार@

Thursday, May 16, 2024

मुक्तक (रस्मे उल्फत)

रस्में उल्फत की अपने दिल में रवानी रखना।

फिर से मिलने ओ मिलाने की कहानी रखना।

लाख हो जुल्म के पहरे वफा की राहों में,

अपनी आंखों में मुहोब्बत की निशानी रखना।

डा अनिल जैन उपहार

Wednesday, May 15, 2024

मुक्तक (रिश्तों का मंडप)

रिश्तों के मंडप के नीचे भाव समर्पण होता है।

संस्कारों का शामियाना महिमा मंडित होता है ।

कभी वहम की चिंगारी जब अहम पे भारी हो जाए,

तब नैतिक मूल्यों का दर्पण अपना वैभव खोता है ।

डा अनिल जैन उपहार

Monday, May 13, 2024

मुक्तक(खामोशी की ओढ़ के चादर)

खामोशी की ओढ़ के चादर बिन बोले रह जाते है ।
कुछ सपने पलकों पर आकर अलसाये रह जाते है ।
माना शोहरत और ये दौलत रहन तुम्हारे आंगन में,
कुछ किस्से ऐसे  होते है बिना कहे कह जाते है ।

डा अनिल जैन उपहार

Saturday, May 11, 2024

लेखा कर्मो का(

स्मृति  के गलियारों में ,कर्मो का लेखा जांच रहा हूं।

मैं अतीत के धुंधले पन्ने ,तोल मोल कर बांच रहा हूं।

जीवन की अंतिम सांसों की, गठरी कुछ खामोश पड़ी है।

कितना छल कितना धोखा पल पल देखा किश्त बड़ी है।

डा अनिल जैन उपहार

Wednesday, May 1, 2024

भाग्य के घर देर ही है (मुक्तक)

प्रारब्ध माना आंसुओं से यह समय का फेर ही है।
यति नियम सब गति समाहित भाग्य के घर देर ही है।
अनसुना सब मौन ही था अधर पढ़ते कैसे कथानक,
किरदार अपना अपना ही था कैसे कह दूं बेर ही है।

डा अनिल जैन उपहार

Saturday, April 27, 2024

संवाद हीनता(मुक्तक)

संवाद हीनता बढ़ती जाती रिश्ते रोज़ दरकते है।

संबंधों के कैनवास पर पथराए नयन तरसते है।

खामोशी को ओढ़ अधर सहमे सहमे रहते है,

अवसादों के घने से बादल आंगन रोज बरसते है।

डा अनिल जैन उपहार

Friday, April 26, 2024

गांव की याद (मुक्तक)

रूखा सूखा खाकर भी नित नींद चैन की सोते थे।
रोज चोपालें सजती थी सब नेक फैसले होते थे।
वक्त की आंधी खूब चली रूठ गई पीपल की छांव,
याद बहुत आता है मीठे सपनों का वो अपना गांव।

डा अनिल जैन उपहार

Friday, April 19, 2024

मुक्तक (सहजता)

सहजता की क्या कीमत है कभी तुम जान न पाए।
मिली मेहनत से ये शोहरत कभी तुम मान न पाए।
रही छलती सदा ही भावनाए कामनाओं को,
वजह बस इतनी ही सी थी यही तुम जान न पाए।

डा अनिल जैन उपहार

शेर

माना तुम्हारे कद से ऊंचा कद नहीं मेरा।
पर साजिशों ने हर घड़ी संवारा है मुझे।

डा अनिल

Sunday, April 14, 2024

मुक्तक (अंतर)

तुम इंतज़ार से रहे सदा,मैं नेह दीप की बाती सा।

तुम स्मृति के शिलालेख से,मैं धुंधली सी पाती सा।

कुछ जटिल प्रश्न थे  हल हो कैसे लगे रहे इस उलझन में,

तुम भौतिकता की चकाचौंध,मैं पुरातन परिपाटी सा।

डा अनिल जैन उपहार

Wednesday, April 10, 2024

मुक्तक(मुस्कान लिखो)

चेहरे पर मुस्काने हो, सदभावों को उपमान लिखो।
सप्तपदी की परंपरा का नूतन सा दिनमान लिखो।
जीवन पथ पर आशाओं के बिंब उकेरो बस हर पल,
सप्त पदों की सरगम सा फिर कोई यशगान लिखो।

डा अनिल जैन उपहार

Friday, April 5, 2024

मन देहरी (मुक्तक)

द्वार द्वार देहरी देहरी पर हमने वंदनवार सजाए।

कुछ गीतों के कलश रखे कुछ भावों के अर्घ्य चढ़ाए।

शगुन के अक्षत मन आंगन पर धरे कामना यूं बोली,

नेह से व्याकुल निष्ठुर मन को कोई कैसे क्या समझाए।

डा अनिल जैन उपहार

Sunday, March 31, 2024

मुक्तक (कैक्टस उगने लगे)

हास और परिहास लिए लिख बैठी पाती आंगन में।

वो अमुआ की महकी डाली राग छेड़ती आंगन में।

बूढ़ा बरगद गुमसुम क्यों है पूछ रही फिर गौरैया,

नीम गया कैक्टस उग आया भौतिक वादी आंगन में।

डा अनिल जैन उपहार

Tuesday, January 2, 2024

मुक्तक(पुण्य से फलित)

पुण्य से फलित हुए परिणाम का आधार हो।

अतृप्त मन की प्यास हो या नेह का विस्तार हो।

अनसुनी फरियाद हो या हो मौन कोई साधना,

तुम ही बताओ ओ शुभे तुम कौनसा उपहार हो।

डा अनिल जैन उपहार