Friday, September 18, 2020

कविता(बेबसी)

दस्तूर
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विपदाओं के गहन तल में
हर बार घिरता हुआ जीवन
तलाश ही लेता है 
उम्मीद का उजाला ,
नही हारता यह मन 
थकने नही देती है 
जिजीविषा,
चीथड़ों में से उघड़ती देह
ढंक लेती है पेट की गरीबी।

उसे याद है ,बेबसी जमाने की।
कुछ ही पलों में तोल दी जाएगी
 बदचलनी के तराजू में उसकी 
कोमल देह।।।।

डॉ अनिल जैन उपहार

Tuesday, September 8, 2020

कविता(वज़ूद)

प्रतीक्षा की नर्म नाज़ुक 
हथेलियों ने 
रचा ली है आज मेहंदी ।

मन की कच्ची दीवारे 
भयभीत है 
अवसरवादी हवाओं की 
छुअन से,
कोई मौन संवाद 
दे रहा है दिलासा
बुनियाद रखी है मेहनत से
किसी ने अपनी आरजुओं को
कर के दफन,
 हो सके तो सहेज लेना तुम भी  
ठीक उसी तरह,
जिस तरह सहेज कर 
खो गया कोई
 अपना वजूद 
दे कर छत तुम्हे । ।

अनिल जैन उपहार

Sunday, September 6, 2020

मुक्तक(ज़हन में )

ज़हन में हर घड़ी मेरे तेरी यादों का साया है ।
मगर तू है नही मेरा,नहीं लगता पराया है ।
किसी की आंख का आँसू चुरा पलकों पे रख लेना
मुहोब्बत का यही लहज़ा तो मैने तुमसे पाया है ।

डॉ अनिल जैन उपहार

Friday, September 4, 2020

शिक्षक दिवस पर कविता

शिक्षक दिवस की बधाई।

मैं नन्हा सा दीपक हूँ और तुम सूरज की ज्योति हो ।

मैं अदना सा अल्हड़ जुगनू तुम उजले मन के मोती हो।

तुम से ही सीखी है मैंने कलम कविता की भाषा,

तुम से ही जानी है मैंने महाकाव्य की परिभाषा।

देख तुम्हारे कदमों को मैंने भी चलना सीख लिया,

शब्द शिल्प की भाषा को मैंने भी पढ़ना सीख लिया।

सीख लिया टूटे शब्दों से माला के मोती  जड़ना ,

शब्द ब्रम्ह है शब्द शाश्वत साहित्य सृजन में नित बढ़ना।

साहित्य सूर्य की ज्योति तुम हर छंद में अर्पित करता हूँ।

श्रद्धा के स्वर्णिम पुष्प तुम्हें लो आज समर्पित करता हूँ।

डॉ अनिल जैन उपहार #कॉपी राइट

Wednesday, September 2, 2020

माँ हिंदी कविता

कभी लिखूँ में तुझे रुबाई 
या तुलसी की चौपाई लिखूं।
कभी मीर की ग़ज़ले लिख दूं
या शब्दों की अंगनाई लिखूं।
अनुप्रास तुम ही जीवन का
यमक श्लेष सा सार लिखूं।
कभी लक्षणा कभी व्यंजना
अभिधा का विस्तार लिखूं।
उपमाओं में बांधूं कैसे
नवगीत लिखूं या छंद लिखूं।
तुम कविता हो हर जीवन की
जीवन का अनुबंध लिखूं।
मधुर कामना तुम वसंत की
यौवन का दिनमान लिखूं।
कभी रूपसी कभी प्रेयसी
जायसी का श्रृंगार लिखूं।
वेद ऋचा सी तुम हो पावन
उर अंतर में आ जाओ
मेरे सूने इन अधरों पर
माँ हिंदी तुम छा जाओ।

डॉ अनिल जैन उपहार