हर बार तुमने
मेरी सूनी कलाई पर
अपने स्नेह के हस्ताक्षर कर
अपनी दुआओ के तमाम दस्तावेज
मेरे नाम कर दिए ।
और मैंने भी रवायतो के खाली
प्रष्ठ पर अपनी जेब के कुछ पल
तुम्हारी हथेली पर रख
अपने फ़र्ज़ की इति श्री कर ली ।
क्या सही अर्थों में
निभा पाया हूँ मै तुम्हारे स्नेह के
मुल्य कों ?
आज के इस पवित्र दिन
मेरे हाथों में बंधे इस धागे की कसम
मेरा वचन है तुम्को
की अब कोई बहन अपने भाई से
नही मांगेगी रक्षा का वचन ।
हर भाई ठीक मेरी ही तरह
निभाएगा हर वो फ़र्ज़
जिस पर सिर्फ बस सिर्फ बहन
तुम्हारा ही हक होगा ।
और दूर चौराहों पर तुम कर सकोगी
बेखोफ विचरण
हजारो की भीड़ में और हर वक़्त
खड़ा पाओगी किसी भाई को अपने
साथ ।
-----------अनिल उपहार --------
No comments:
Post a Comment