जौहर की ज्वाला को जिसने माना अपना गहना था ।
सती हो गयी छत्राणि नही गुलामी सहना था ।
जिसकी गौरव गाथाए युग सदियो से गाता है ।
कोमलांगी थी वो बाला सच इतिहास बताता है ।
फिर कैसे उसके वैभव पर तुम प्रश्न चिन्ह लगा बैठे ।
भूल गए मर्यादा सारी माँ का दूध लजा बैठे ।
भौतिकता की चकाचौंध में नैतिकता को भूल गए
अपनी अस्मिता को भूले नग्नता पर फूल गए ।
दौलत के बाजार के तुम अदने से व्यापारी हो ।
जम्बूरे के इशारों पर नाचने वाले मदारी हो ।
पद्मिनी का इतिहास ज़रा भी दिल से तूने पढ़ा होता ।
ख़िलजी के तलवो की कालिख अपने सर न मढ़ा होता ।
तुम क्या जानो मर्यादा वो सबक नही पढ़ पाये तुम ।
इतिहासों के शिलालेख के अक्षर बांच न पाये तुम ।
थौति शोहरत के चक्कर में अपने उसूल तक भूल गए ।
पद्मा का यश गाना था ख़िलजी की बाँहों में झूल गए ।
अमर इतिहास है रानी का सिरफिरों के बस की बात नही ।
धूल चुमले क़दमों की उस ख़िलजी की औकात नही ।
अनिल उपहार
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