Thursday, November 16, 2017

कविता(लिख-जोखा)

संवेदना के आईने में
नही उभरता
अब कोई अक्स
अपनेपन का ,

शब्दों के रुमाल
झाड़ने लगते है
स्वार्थ की महीन
धूल ।

गरीब होती
वैचारिक सम्पदा
अस्तित्व खोते
संस्कार युक्त वैभव ने

लिख दिया है लेखा जोखा
समय के भाल पर ।

इतिहास लिखेगा
वृतांत
कर्मो की स्याही से ,
तब नही होगा सामर्थ्य
बांचने का ,
पथराई आंखों में ।।।।

#अनिल जैन उपहार
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