Friday, February 9, 2018

मुक्तक(धूप)

अतृप्त मन की भग्न वीणा ,का करुण एक गान हो ।

खंडित हुए विश्वास की ,खोई मधुर मुस्कान हो ।

अपना समझने का भरम,पाले, छला मैने स्वयं को,

पर,छत पे उतरी धूप जाड़े, की, सी तुम महमान हो ।

#अनिल जैन उपहार कॉपीराइट

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