Tuesday, January 29, 2019

कविता(सजा)

दंश सदा सहती आई जो सदियों अत्याचारों का ।
किस्मत रूठ गयी हो जैसे अंत नही चीत्कारों का।
कभी दामिनी निर्भया कभी आरिफा बन चीखी
घर की चौखट ना लांघी बस मर्यादा ही थी सीखी ।
संस्कारों की बली चढ़ा वो दुष्ट हदे सब पार गया ।
जिस तन पर ममता बहनी थी नाखूनों से तार गया ।
जख्म नही मेरे सीने पर ये दाग है भारत माता पर।
लोकतंत्र की कालिख धोती उजली धवल पताका पर।
प्रश्न मौन हो मांग रहे है न्याय मिले उस जान को ।
सजा मुकर्रर करदी रब ने फाँसी हो इरफान को ।

अनिल जैन उपहार

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