विवशता
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जिंदगी की जंग में
हर बार मर जाती है
आत्मा
हार जाता है आदमी
अपना अस्तित्व बचाने की
लाचारी में ,
कल्पना के पंख
लगते है निगलने
वजूद के अवशेष।
अरमानों के शिखर
चढ़ जाते है भेंट
अति आधुनिकता की होड़ में।
विवश हृदय
हर बार घरौंदे को बचाने की
जुगत में पी जाता है
लहू के घूंट
और बिखरे हुए तिनकों को
एक जुट करने की
जद्दोजहद में ,
करने लगता है अपनी सांसों की
टूटती गति से
जड़वत होते रिश्तों में
प्राण फूंकने की
असफल कोशिश ।
लेकिन अपनापन बौना हो
कर देता है समर्पण
देह की असीमित परिधि में
खोजने ,नूतन रिश्तों की
चमक दमक।
आँगन में खड़ा बुढा बरगद
लाचार हो देख रहा है
आँगन से अपनी विदाई का
मुहूर्त।।।।।
डॉ अनिल जैन उपहार
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