क़तरा-ए-अश्क़ बनके टपकता रहा हूँ मै ।
अंगार की मानिंद दहकता रहा हूँ मै ।
मेंहंदी से लिखा नाम हथेली पे जो उसने
खुशबू से सारी रात महकता रहा हूँ मैं।
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अनिल डॉ अनिल जैन उपहार
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