वक्त के थपेड़े
तोड़ देना चाहते थे
सारा भरम
जो पाल रखा था
सुनहरी आंखों ने ।
देह की दस्तक पर
पड़े हर एक निशां को,
मिटा देना चाहती थी
संवेदन हीनता की स्याही,
बेचारे अल्फ़ाज़ देते रहे
गवाही हर बार की तरह ।
उसने तो लिख दिया था
हलफनामा
अपनी बेगुनाही का।
न्यायाधीश बना मन
सुनना ही कहाँ चाहता था
कोई और दलील ।
बस इंतज़ार है
फैसले का ,जिसे मानना है
नही चाहते हुए भी ।
डॉ अनिल जैन उपहार
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