Monday, July 27, 2020

गीत दुर्दिनों का सफर

दुर्दिनों का सफर तुम क्या जानो
दर्द छालों के हमने सहे है ।
तुमको सब कुछ मिला जिंदगी में
हम अभावों के पाले रहे है ।

सर्द रातों में जलता रहा हूँ
हिमगिरि सा पिघलता रहा हूँ।
ओढ़ इज्ज़त का सर पे दुशाला
ढलते सूरज सा ढलता रहा हूँ।
भोर ने भी कभी ना दुलारा
दूर हमसे उजाले रहे है।

चाहतों ने दिये जब जलाए।
वक़्त ने अपने हाथों बुझाए।
इस कदर बेबसी ने है घेरा
हम जिये भी और जी भी न पाए

ना खुशी ही कभी रास आई
उम्मीदों पर भी पहरे रहे है ।

देहरी के दिये सा जला हूँ
हर कदम खुदही खुद से छला हूँ।
थक न जाऊं सफर में कहीं मैं
बन के बैसाखी लम्बा चला हूँ।

हसरतें भी रही सब अधूरी
सिर्फ तानों के साये रहे है ।


डॉ अनिल जैन उपहार

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