Monday, April 12, 2021

कविता (भावांजलि)गुरुवर विमर्श सागर जी के श्री चरणों में

आचार्य विमर्श सागर जी के चरणों में,,,,,,

आगम निष्ठ तपस्वी वाणी रागद्वेष कल्मष धोती।
'समर्पण के स्वर' संग गूथे "मानतुंग "के अनुपम मोती।'गूंगी चीख' 'वन्दनीय गुरुवर' 'शंका की एक रात'।
'सोचता हूँ कभी कभी' मैं पाऊँ नित्य गुरु आशीर्वाद।
विमार्शनजली,गीतांजलि,वीरागा जंलि क्या खूब कही।
जीवन पानी की बूंद है भैया जीवन चलती हुई घड़ी।
'खूबसूरत लाइने' जाहिद की गज़ले गाती है।
शुद्धात्म साधक कलम योद्धा का चिंतन दर्शाती है ।
है शब्द चितेरे ,कलम धनी,श्रद्धा से करता अभिनंदन
उपहार का पावन चरणों मे स्वीकार करो शत शत वन्दन।

डॉ अनिल जैन उपहार

जिनके चिंतन में झलक रही इस नश्वर जग की नश्वरता।
जिनकी निर्मल वाणी में अमृत का झरना ही झरता।
जिनके पावन दर्शन पाकर आल्हादित होते है भविजन
उन परम पूज्य निर्ग्रन्थ गुरु के चरणों मे शत शत वन्दन।

जिनके पावन श्री मुख से अमृत की निर्झरणी झरती।
जिनके चरण कमल की रज भव तापों की ज्वाला हरती।
तत्वज्ञान से महिमा मंडित है जिनका मौलिक चिंतन,
उन परम पूज्य विमर्श गुरु के चरणों मे शत शत वन्दन।

डॉ अनिल जैन उपहार

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