काव्यांजलि
Thursday, July 16, 2026
मुक्तक चाहत
माना कि जटिलताएँ है जीवन की राह में।
है ज़ख्म बहुत गहरे ही उल्फ़त की चाह में।
बे वक़्त की बारिश सा था आँखों का बरसना,
हुए राज़ कितने ही दफन चाहत की थाह में।
डॉ अनिल जैन उपहार
Newer Posts
Older Posts
Home
Subscribe to:
Posts (Atom)