स्वार्थ की दहलीज पर
नहीं जलते है दीप
चाहत की बाती से।
पल पल छोटी होती
अपनेपन की चादर
समेट लेती है
जीवन का कुहासा
किसी हारे हुए
पथिक की तरह।
उम्मीदें दम तोड़ देती है
तवायफ के घुंघरू की तरह
बदहवास रिश्तों की पायल
खो चुकी है सारे स्वर
शायद यही है मनुष्य भव की
दुर्दशा।।।।।।
डॉ अनिल जैन उपहार
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