Thursday, November 27, 2025

कविता मनुष्य भव

स्वार्थ की दहलीज पर
नहीं जलते है दीप
चाहत की बाती से।
पल पल छोटी होती
अपनेपन की चादर
समेट लेती है 
जीवन का कुहासा
किसी हारे हुए
पथिक की तरह।
उम्मीदें दम तोड़ देती है
तवायफ के घुंघरू की तरह
बदहवास रिश्तों की पायल 
खो चुकी है सारे स्वर
शायद यही है मनुष्य भव की
दुर्दशा।।।।।।

डॉ अनिल जैन उपहार

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