एक गीत आपकी अदालत में
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मैं उड़ना चाहता हूं पंख को परवाज़ देना तुम।
मेरे हर गीत को अपनी मधुर आवाज देना तुम।
लगे गर वक्त जब छलने मेरा आधार बनना तुम।
मेरे सूने से जीवन का हंसी संसार बनना तुम।
विरह के गीत गाऊ तो सुरीला साज देना तुम।
मेरे हर गीत को अपनी मधुर आवाज़ देना तुम।
कली तुमको लिखा मैने तो भंवरा जल गया मुझसे।
तुम्हे मैं ज्योत लिख बैठा पतंगा अड गया मुझसे।
लिखे जो ख़त तुम्हे मैने न उनका राज़ देना तुम।
मेरे हर गीत को अपनी मधुर आवाज़ देना तुम।
सृजन की तुम हो उपमाएं तुम्ही अनुप्रास जीवन का।
तुम्ही नवगीत हो मेरा तुम्ही हर छंद यौवन का।
चढ़ाऊं अर्घ्य शब्दों के नया अंदाज़ देना तुम।
मेरे हर गीत को अपनी मधुर आवाज़ देना तुम।
डॉ अनिल जैन उपहार
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