Monday, February 10, 2014

------------अस्मिता------------
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हर  बार  देती  रही 
अग्नि  परीक्षा |
जैसे  स्त्री  होना  गुनाह  रहा  उसका,
मनु  के  विधान  की  तरह 
समझा  गया  सभी  बुराइयों  की  जड़,
कभी  जाति  के  नाम  पर 
तो  कभी 
धार्मिक  कर्मकाण्डो,
आडम्बरों  के  नाम  पर |
झोंक  दी  गई ,बलि  कर  दी  गई 
उसकी  अस्मिता |
पुरुष  बन  सकता  है 
पिता  होते  हुए  भी  सब  कुछ 
वह  माता  बनकर 
कुछ  और  क्यों  नही  बन  सकती ?
बचपन  में  पिता  की  चौकसी 
युवावस्था  में  पति  का  पहरा 
और 
बुढ़ापे  में  पुत्र  रखे  उस  पर  नज़र 
जैसे  वह  जन्म  जात  अपराधिनी  हो |
कभी  उसे  रमणी, कामिनी ,भोग्या
पदवी  से  विभूषित  किया  गाया |
तो  कभी, जिस्म  के  व्यापार  में 
धकेल  दिया  गया |
हमे  ही  आधार  बना 
कविता  देती  रही 
अनुभूतियों  कों  दस्तक |
वैचारिक  शून्यता  और 
आस्था  का  अभाव
क्या  दे  पायेगा ?
हमारी  अस्मिता  कों  नया   आकाश |

-----------अनिल उपहार ------------
"काव्यांजलि" नयापुरा रोड पिडावा (राजस्थान) 

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