एक अजीब सा सम्मोहन था
उसकी बातों में ,
उसका हर्फ़ हर्फ़
अदबी इतिहास की
गवाही सा प्रतीत होता
था ।
उसकी लेखनी
छंद बन गीतों में ढल जाया
करती थी ।
संस्कारों की पाठशाला का
कुशल विद्यार्थी था वो ।
अवसाद के बादल
कभी बरस नही पाए थे
उसके आँगन में ।
संवेदना के दो चार छीटें ही
काफ़ी थे उसके
किसी की पीड़ा को
हर लेने के लिए ।
थोती विरदावलियाँ
भाती ही नही थी उसे ।
शायद यही अच्छाइयां
हर बार थोप देती थी
प्रश्न चिन्ह
उसकी कार्यशैली पर ,
ओर वो होजाता था निशब्द
अपनी बेगुनाही के
सबूत जुटाने में ।
अनिल जैन उपहार
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