Saturday, May 22, 2021

मुक्तक (समर्पण)

मौन का व्याकरण मौन पढ़ता रहा।
कौन उपमान आकर यूं गढ़ता रहा।
छंद प्रतिमान खुद ही बदलने लगे
आचमन प्रेम का प्रेम जढ़ता रहा।

डॉ अनिल जैन उपहार

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