काव्यांजलि
Thursday, May 27, 2021
काहे रोना(मुक्तक)
लग गया विराम है कुछ पल का, ना विचलित हमको होना है।
फल पड़े भोगना कर्मों का,यह तो निश्चित ही ढोना है।
शुभ अशुभ राग के गलियारे सब तरफ स्वप्न गर बिखरे हों
जब जीत हार सब अपनी है फिर काहे रोना धोना है।
डॉ अनिल जैन उपहार
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