बड़े दयालु हो बदरा तुम
तुम नही देख सकते
इंतज़ार में पथराई आंखें
भले ही सब तुम्हें कोसने में
लगे रहे,
तुमने उम्मीदों के शिलालेख पर
कर ही दिये हस्ताक्षर फुहारों के।
भिगो दिये
तपते अलसाये मिट्टी के
जड़वत पड़े
खेत खलिहानों को।
लौटा दी फिर से चादर
हरीतिमा की।
बस ऐसे ही महरबानी बनाए रखना
और बरस जाना टूटी उम्मीदों को ज़िंदा रखने के लिए।
डॉ अनिल जैन उपहार
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