ये जो तुम्हारे सख्त लहज़े की तहरीर है न बड़ा नर्म अहसास कराती है पथराई आंखों को । शायद इन्ही में गुम तो नहीं हौसलो के पर जो खींच लाये है तुम्हे धरती से आसमा पर ।
अनिल जैन उपहार
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